पवित्र अध्ययन
भावना उपनिषद्
श्रीचक्र मनुष्य के आन्तरिक मानचित्र के रूप में चिंतनित हो सकता है।
Bhāvanā Upaniṣad
श्रीचक्र मनुष्य के आन्तरिक मानचित्र के रूप में चिंतनित हो सकता है।
- वेद अथर्ववेद — इस ग्रन्थालय की सम्बद्धता।
- वर्ग शाक्त उपनिषद्; यहाँ मुक्तिका ८४।
- आकार शान्ति के बाद गद्य समन्वय; यह ग्रन्थालय चार उद्धृत इकाइयाँ खोलता है।
सरल परिचय
यहाँ भावना स्थायी मनन है — चेतना में धारण — हल्की कल्पना नहीं। पाठ देह, इन्द्रिय, मन, शक्ति और पवित्र ज्यामिति को जोड़ता है ताकि पूजक, पूजा और पूज्य की दूरी घुले। चित्र भीतर पढ़ा जाता है जब तक मानचित्र और मानचित्रकार एक आसन पर बैठें।
नया पाठक एक सरल त्रयी के पास बैठ सकता है: ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय। श्रीचक्र शक्तियों की ज्यामिति कहा जाता है जिसे जीवन्त देह में पहचाना जा सकता है। नौ रन्ध्र, नौ शक्तियाँ, गुरु सर्वकारण शक्ति — पाठ जो समन्वय नामता है। यह पृष्ठ उन्हें अर्थ का मानचित्र कहकर वर्णन करता है।
मुद्रित पाठ शान्ति के बाद गद्य है, पंक्ति-संख्या की संहिता नहीं। यह ग्रन्थालय चार उद्धृत इकाइयाँ खोलता है ताकि पाठक बाहरी चित्र से चेतना की ओर सुने, फिर नामित संस्कृत डॉक्यूमेंट्स पृष्ठ पर पूरा समन्वय देखे।
पाठ क्या सिखाता है
भावना स्थायी दर्शन
भावना मनन का धारण है, ऐसी समझ जो विषय के पास रहती है।
पाठ उस धारण को ज्यामिति, देह और चेतना की ओर बुलाता है।
आन्तरिक मानचित्र
श्रीचक्र मनुष्य से जुड़ा है ताकि चित्र भीतर से पढ़ा जाए।
देह, इन्द्रिय, मन और शक्ति समन्वित क्षेत्र नाम से।
ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय
सरल त्रयी नए पाठक की सहायक है: कौन देखता है, देखना, जो दिखाई देता है।
पाठ की अन्तर्मुखी चाल में तीन एक आसन की ओर आते हैं।
समन्वय वर्णन
नौ रन्ध्र और नौ शक्तियाँ समन्वय नाम से हैं, इस पृष्ठ पर अभ्यास-क्रम नहीं।
गुरु सर्वकारण शक्ति — पाठ जो तात्त्विक पहचान कहता है।
चित्र से चेतना
परिचय अन्तर्मुखी चाल का अनुसरण करता है: बाहरी ज्यामिति, जीवन्त देह, चेतना।
इस स्थल का अन्वेषक कक्ष उन समन्वयों की अध्ययन-मेज़ है।
कैसे पढ़ें
समन्वय को अर्थ का मानचित्र मानकर पढ़ें। चित्र से चेतना की अन्तर्मुखी चाल पर रहें। पाठ लम्बी पहचान-सूची में घना हो तो यह परिचय केन्द्रीय भाव रखता है: पूजक, पूजा और पूज्य निकट आते हैं।
नीचे का अन्वेषक उन स्तरों की अध्ययन-मेज़ है। प्रत्येक गद्य-पंक्ति से पहले नामित पाठ खुला रखें।
मुख्य पद
- भावना bhāvanā
- स्थायी मननशील समझ।
- श्रीचक्र śrīcakra
- पवित्र ज्यामिति, यहाँ जीवन्त देह से जुड़ी।
- शक्ति śakti
- शक्ति; यहाँ गुरु सर्वकारण शक्ति नाम से।
- गुरु guru
- आरम्भ में सर्वकारण रूप में नामित गुरु।
- ज्ञाता jñātā
- ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय त्रयी का ज्ञाता।
जिस पाठ से आरम्भ करें
Bhāvanā Upaniṣad, opening (Sanskrit Documents recension)
आत्मानमखण्डमण्डलाकारमवृत्य सकलब्रह्माण्डमण्डलं स्वप्रकाशं ध्यायेत् । ॐ श्रीगुरुः सर्वकारणभूता शक्तिः । तेन नवरन्ध्ररूपो देहः । नवशक्तिरूपं श्रीचक्रम् ।
पाठ आत्मा को अखण्ड मण्डल रूप में वर्णित करता है, पूरे ब्रह्माण्ड को ढककर, स्वप्रकाश। श्रीगुरु सर्वकारण शक्ति नाम से उच्चारित हैं। देह नौ रन्ध्रों का रूप; श्रीचक्र नौ शक्तियों का रूप।
प्रसंग और योग
मूल पाठ
त्रिपुरा के पास
त्रिपुरा देवी को त्रयी के भीतर से सुनता है। भावना पवित्र ज्यामिति को आन्तरिक मानचित्र कहकर सुनती है। साथ में नाम से रूप-ध्यान की ओर जाते हैं।
परम्परा
श्रीविद्या ज्यामिति
आगे की श्रीविद्या परम्परा इन समन्वयों को चित्र का पूर्ण आन्तरीकरण कहकर सुनती है। वह श्रवण यहाँ परम्परा नाम से।
मीनानन्द का श्रवण
यह घर कैसे सुनता है
यह घर घुलती दूरी को वही जीवन्त अन्तराल कहकर सुनता है जो स्फुरण के दर्शन में नाम पाता है।
प्रामाणिक पाठ और आगे का अध्ययन
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