पवित्र अध्ययन
पूर्णमदः
Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad 5.1.1 śānti (also Īśāvāsya śānti in some recitations).
Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad 5.1.1 śānti (also Īśāvāsya śānti in some recitations).
मूल शास्त्र-पाठ
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
IAST लिप्यन्तरण
समीपस्थ अनुवाद
वह पूर्ण है; यह पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण उठता है। पूर्ण से पूर्ण लेने पर पूर्ण ही रहता है। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
पाठक-सुलभ अर्थ
ब्रह्म पूर्ण है — पूर्ण से ही पूर्ण उदय होता है। पूर्ण से पूर्ण लेने पर भी पूर्ण ही रहता है। अक्षय पवित्र भण्डार की शान्ति-मन्त्र।
मीनानन्द सम्पादकीय व्याख्या
ईशा-अध्ययन या शान्त बैठक से पहले यह पंक्ति घर को याद दिलाती है: पवित्र दान देकर भी दाता पूर्ण ही रहता है। सेवा ऐसे भण्डार से बहती है जो पूर्ण ही रहता है। आश्रम में उपनिषद्-पाठ इसी विश्वास से खुलता और समाप्त होता है। इस मन्त्र का गहरा अर्थ, जप की लय या दीक्षा का मार्ग जानने के लिए मीनानन्द आश्रम से सम्पर्क कीजिए।
साधना का प्रसंग
उपनिषद्-पाठ के मुखबन्ध या समाप्ति की शान्ति के रूप में बोलिए। घर की लय के लिए आश्रम से पूछिए।
पदार्थ
- पूर्णम् — पूर्ण
- अदः — वह
- इदम् — यह
Bṛhadāraṇyaka 5.1.1 śānti; public-domain. Sanskrit: public domain. Foundation translations: CC BY-SA 4.0.