पवित्र अध्ययन
त्रिपुरा उपनिषद्
त्रिपुरा तीन की देवी हैं — पुनरावृत्त त्रयी के भीतर घना ध्यान।
Tripurā Upaniṣad
त्रिपुरा तीन की देवी हैं — पुनरावृत्त त्रयी के भीतर घना ध्यान।
- वेद ऋग्वेद — इस ग्रन्थालय की सम्बद्धता।
- वर्ग शाक्त उपनिषद्; यहाँ मुक्तिका ८२।
- आकार संस्कृत डॉक्यूमेंट्स के पाठ में सोलह अंकित मन्त्र।
सरल परिचय
त्रिपुरा का अर्थ है तीन की वह। परम्परा ने उन तीन को लोक, जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति, इच्छा-ज्ञान-क्रिया, या चेतना की रीति कहकर सुना है। यह पृष्ठ त्रयी को पाठ-परिवार रखता है। पाठ घना ध्यान है: देवी लौटती तीनों के भीतर चिंतनित हैं, और कविता इतनी घनी है कि संस्करण के बिना एक अक्षर नहीं खोलना चाहिए।
त्रिपुरसुन्दरी और श्रीविद्या इस श्रवण के ऐतिहासिक और धारणागत पड़ोसी हैं। नया पाठक परिवार पहचाने इसलिए नाम। इस पृष्ठ पर वे पड़ोसी हैं: ऐसा ज्ञान जिसका रूप, सौन्दर्य और त्रिधारा लय हो, विद्या नाम से उच्चारित।
धीरे पढ़ें। संस्कृत डॉक्यूमेंट्स सोलह अंकित मन्त्र छापते हैं। आगे की टीका श्रीविद्या के योग से घन करती है। यह परिचय बड़ा भाव रखता है — तीन की वह — ताकि पाठक नामित पाठ पर जाने से पहले पाठ के पास बैठे।
पाठ क्या सिखाता है
तीन की वह
त्रिपुरा नाम ही तीन की लय सिखाता है।
लोक, अवस्था और शक्ति परम्परा के श्रवण हैं; यह पृष्ठ उन्हें पाठ-परिवार रखता है।
घनी काव्य-भाषा
पाठ घन है। एक मन्त्र देवी के प्रति कई स्तरों का सम्बोधन रख सकता है।
एक अकेले अक्षर से निष्कर्ष के लिए नामित संस्करण चाहिए।
श्रीविद्या पड़ोस
त्रिपुरसुन्दरी और श्रीविद्या नए पाठक को शाक्त इतिहास में पाठ बैठाने में सहायक हैं।
इस पृष्ठ पर वे धारणा के पड़ोसी हैं।
विद्या का रूप है
पाठ ज्ञान को सुन्दर, त्रिधारा और उच्चारित होने देता है।
सौन्दर्य यहाँ सत्य का चिंतन है।
अर्थ से पहले संस्करण
संस्कृत डॉक्यूमेंट्स के सोलह मन्त्र बाहरी आकार देते हैं।
भीतरी योग टीका और परम्परा के हैं; नीचे उसी नाम से।
कैसे पढ़ें
त्रयी अनेक अर्थ रखे। पंक्ति अनुष्ठान का संकेत लगे तो देवी के काव्य-सम्बोधन पर रहें। गुप्त अक्षर के शिकार से धीरा कान अधिक फल देता है।
नामित पाठ खुला रखें। श्रीविद्या की टीका उसी आकाश का आगे का प्रकाश है; नीचे टीका नाम से।
मुख्य पद
- त्रिपुरा tripurā
- तीन की वह।
- त्रिपुरसुन्दरी tripurasundarī
- तीन नगर या तीन अवस्था की सुन्दरी देवी, पड़ोसी नाम।
- श्रीविद्या śrīvidyā
- त्रिपुरा से जुड़ी शाक्त विद्या; यहाँ इतिहास।
- विद्या vidyā
- इस पाठ में रूप और लय वाला ज्ञान।
- मन्त्र mantra
- मुद्रित पाठ की अंकित पवित्र वाणी।
जिस पाठ से आरम्भ करें
Tripurā Upaniṣad 1 (Sanskrit Documents numbering)
ॐ तिस्रः पुरास्त्रिपथा विश्वचर्षणा अत्राकथा अक्षराः सन्निविष्टाः । अधिष्ठायैना अजरा पुराणी महत्तरा महिमा देवतानाम् ॥
ॐ। तीन पुर, तीन पथ, विश्व को देखने वाली; यहाँ अव्यक्त अक्षर बैठे हैं। उनकी अधिष्ठात्री अजरा पुराणी — देवताओं की बड़ी महिमा।
प्रसंग और योग
मूल पाठ
देवी और भावना के पास
देवी उपनिषद् देवी को ब्रह्म कहती है। भावनोपनिषद् पवित्र ज्यामिति को भीतर लाती है। त्रिपुरा स्तुति और रूप-ध्यान के बीच बैठती है।
टीका
आगे का श्रीविद्या पाठ
टीका-परम्परा इन मन्त्रों को श्रीविद्या के योग से पढ़ती है। वह पाठ आगे का प्रकाश है, यहाँ टीका नाम से।
मीनानन्द का श्रवण
यह घर कैसे सुनता है
यह घर तीन को जीवन्त अन्तराल कहकर सुनता है — चेतना-स्फुरण की लय।
प्रामाणिक पाठ और आगे का अध्ययन
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