শুভ মহালয়া शुभ महालय 10 अक्टूबर 2026 · 22 आश्विन 1433 · आश्विन अमावस्या

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    गोमुख

    साक्षात्

    गोमुख, रेलपथ, हरिद्वार।

    जागतिक अजागतिक · प्रथम खण्ड

    निवेदन माँ, आज तुम मेरा प्रणाम स्वीकार करो। जागतिक आँखें आकाश को नहीं खोजतीं, क्योंकि तुम मेरे हृदय में गुँथी हो। इसीलिए बाहर देखने पर तुम्हें नहीं पाता; मन करता है, माँ, एक बार तुम्हारा मुख देखूँ। फिर भी भय जैसे हृदय को जकड़े रहता है, इसीलिए तुम्हारे चरण खोज नहीं पाता। ‘माँ, माँ’ कहकर मन ही मन बात करता हूँ; मेरा जो कुछ है, सब तुम्हारा ही दान है। जन्म-जन्मांतर से कृतज्ञ हूँ; भाग्यवान हूँ कि ऐसी माँ मेरी है। मेरी माँ, शतकोटि प्रणाम स्वीकार करो। प्रणाम — मीनानन्द तीर्थनाथः मीनाक्षी देव्यम्बा।

    लेखक-परिचय की आवश्यकता शायद यहीं थी, किन्तु मैं दो कारणों से उससे विरत रहा। पहला, जागतिक और अजागतिक के द्वन्द्व के बीच वास्तविक लेखक की निष्कलुष निजता की रक्षा सदैव वांछनीय है। दूसरा, विशेष उद्देश्य यह है कि पाठक अनावश्यक रूप से लेखक का अनुसरण न करें, बल्कि कथा के विभिन्न पात्रों के साथ यात्रा करें।

    यहाँ यह कहना आवश्यक है कि लेखक के ज्ञानार्जन का स्रोत भले ही शास्त्राध्ययन अथवा पुस्तकीय ज्ञान रहा हो, किन्तु गुरु के आशीर्वाद से लेखक ने इस गम्भीर मौन के माध्यम से शायद हमें उस सत्य से परिचित कराने का प्रयास किया है—पार्थिव और अपार्थिव सभी शक्तियों की अविनश्वरता के भीतर विनाश का एक छिपा हुआ बीज विद्यमान है। हमारी अनुभूति में लेखक शान्त, समाधिस्थ और मौनव्रती हैं।

    जिनकी अदम्य इच्छा और उत्साह से यह पुस्तक सम्भव हुई, वे मेरे रक्त और आत्मा से जुड़े कुछ विशेष नाम हैं। उनका उल्लेख न करना मेरी अमानवीय धृष्टता होगी—मधुश्री, शाश्वती, वैरिका, ऋतमा; विश्वरूप, अर्कव्रत (मुखर्जी); सुदती, अनिन्दिता, ईषा, तृषा, इनु; स्वागता, रीणा, नीता, पायल, ईशानी, गुडलू, नीलांजन, पाँचुगोपाल, उमाशंकर, संदीपन, सायन, सौरभ, माधव, अभिनन्दन, रोहित, दीपक, जयन्त; प्रबुद्ध, जयशंकर, मोहर, विवेक, नाम अस्पष्ट, वाणी।

    प्रूफ़-परीक्षण—उमाशंकर, स्वागता। मूल में अगला शब्द अस्पष्ट: ‘খদতN’

    भूमिका

    हरिद्वार जाने वाली रात्रि की ट्रेन
    हरिद्वार जाने वाली रात्रि की ट्रेन

    यह रचना न कोई परीकथा है, न केवल मनोरंजन के लिए कही गई कहानी। यह इस प्रकृति में पनपने वाले समस्त जीवों की अन्तर्निहित शक्ति के अज्ञात पक्षों का वृत्तान्त है।

    ज्ञानी और अज्ञानी—दोनों उसी शक्ति का आश्रय लेकर निर्भय भाव से भविष्य की योजनाएँ बनाते चलते हैं। इस अस्थायी जगत में स्थायित्व का स्वाद लेकर वे मोह में मतवाले हैं।

    जानता हूँ कि मेरा अन्त होगा और सब कुछ छोड़ जाना पड़ेगा; फिर भी चाहता हूँ कि मेरा सब कुछ मेरा ही रहे। हे विधाता, जानता हूँ कि जीवन का स्रोत तुम्हारे ही हाथों में बँधा है; फिर भी ‘मैं महान हूँ’—इस भावना को छोड़ नहीं पाता। हे ईश्वर, मेरे इस भाव का आवरण खोल दो। इस प्राण में ज्ञान का दीप जला दो, जिसकी अग्नि में मेरा अहंभाव जल जाए। जीवनचक्र के अक्षरों में अंकित ‘जागतिक अजागतिक’ हमारे ही जैसे कुछ पात्रों से निर्मित घटनाओं का उल्लेख है।

    जीवन में सुख-दुःख के बन्धन में फँसे, और जीवन के मन-गढ़े सुख-दुःख को काट फेंकने की आकांक्षा लिए, हमारे ही जैसे कुछ लोग हरिद्वार की राह पर निकल पड़े हैं।

    माँ गंगा के अमृत का थोड़ा-थोड़ा आस्वादन करते हुए, अमृत से पूर्ण कलश बनकर उनके उद्गम में मिल जाने की कामना के साथ, हमारा यह जीवन-दर्शन उन्हीं यात्रियों के पथ में जा मिलता है। करुणामयी माँ की कृपा हुई तो हम सभी एक दिन पूर्णता प्राप्त करेंगे।

    इसी भावना से यह मेरा एक छोटा-सा प्रयास है। इस प्रयास की मेरी विनम्र अपेक्षा केवल इतनी है कि इसे कोई साधारण कथा या कहानी न मानकर हमारे जीवन के सत्य का दर्शन समझा जाए; मैं कृतज्ञ रहूँगा। कामना करता हूँ कि मंगलमयी माँ सबको सद्बुद्धि प्रदान करें। सभी सुखी और स्वस्थ रहें।

    गोमुख गंगा का उद्गम-स्थल है। कहा जाता है कि अपने वेगमय यौवन में उन्होंने शिव की जटाओं में स्थान पाया। हिन्दू धर्म में उनके पवित्र जल को अमृत कहा गया है, जिसके स्पर्श से विष का क्षय होता है। इसी गोमुख से चलकर, गंगोत्री होते हुए हरिद्वार के मार्ग पर, समस्त जीव-जगत की प्राणवायु लिए ‘माँ गंगा’ ने पहली बार समतल भूमि पर चरण रखा।

    साधक-जीवन की साधना-यात्रा में, माँ के आँगन में पले साधक के लिए गंगोत्री एक अत्यन्त आकर्षक स्थल है। यहाँ अनेक साधकों ने अपना लक्ष्य और मार्ग निश्चित किया, अमृत का स्वाद पाया और अमृत-कुम्भ में डुबकी लगाकर अमृतमय ज्ञान का भण्डार प्राप्त किया।

    प्यासा मनुष्य ही अपनी प्यास बुझाने के लिए दौड़ता है। जब आकांक्षा की धारा धमनियों में फूट पड़ती है, तभी हाथ में अमृत-भण्डार लिए ज्ञानस्वरूप गुरु के दर्शन होते हैं। उनके चरणों में स्वयं को शून्य करके, अपने व्यर्थ जीवन के उतार-चढ़ाव छोड़कर और ऋषियों की भूमि में नया जन्म लेकर साधक गुरु-निर्दिष्ट मार्ग पर चलता है—मानव से महामानव बनने की आकांक्षा में, पृथ्वी की आयु तक अमरत्व का नक्षत्र बन जाने की कामना में। गुरु को सहयात्री बनाकर, सृष्टि के रस में निमग्न होकर वह माँ गंगा के कण-कण को नए रूप में पहचानता है; वही सूक्ष्म कण एकत्र होकर मनुष्य के पापों की राशि बहा ले जा सकते हैं।

    शायद इसीलिए आज भी अनेक लोग साधक बनने की इच्छा में दौड़े चले आते हैं। अन्धविश्वास को सत्य मानकर, अज्ञानी गुरु के चरणों में स्वयं को समर्पित कर वे पथभ्रष्ट हो जाते हैं; फिर शास्त्रों के उचित-अनुचित का निर्णय करने लगते हैं। मनुष्य-रूप में पशु बनकर गुरु को सहस्रार में स्थापित करते हैं और माँ गंगा को साक्षी मानकर गंगा-पूजा में रत होते हैं। स्वयं को साधक समझने की मूर्खता दिखाते हुए अन्ततः पाताल की ओर उतर जाते हैं।

    इस सुन्दर प्रकृति के बीच शायद विष-वृक्ष की भी आवश्यकता होती है। इसी विष से…

    …अमृत रचने की प्रेरणा लेकर माँ गंगा निरन्तर प्रवाहित रहती हैं। इस कलियुग के असाधारण भार से माँ गंगा की छाती पर भी बालू के चर उभर आते हैं। उन्हीं चरों पर खड़े होकर लोग असत्य के बीज बोते हैं, हृदय में ईश्वर का आशीर्वाद पाने की आशा बाँधते हैं और तीर्थ-दर्शन करते हैं। वे भूल जाते हैं कि तीर्थ में अनावश्यक विष की आवाजाही से आकाश भी टूट पड़ता है—और वही संकट सच्चे साधक के आगमन का मार्ग समतल करके उसे पुकारता है।

    हर की पौड़ी की सन्ध्या
    हर की पौड़ी की सन्ध्या

    पथ की धूल से सिर उठाती पर्वतमालाएँ, अपरिचित वृक्षों की झूमती डालियाँ, जिनका स्रोत दिखाई न दे ऐसी जलराशियाँ, और पंक्तिबद्ध वृक्षों से झरती पुष्प-वर्षा—सब मानो राज्याभिषेक के उल्लास में मतवाले हैं। तभी मन कह उठता है, “हे ईश्वर, तुम कितने सुन्दर हो! मेरे ही लिए तुमने नैवेद्य की यह थाली सजाई है।” इस अनुपम रस को मैं कहाँ सँजोऊँ? इसीलिए आज इस ब्रह्माण्ड में मैंने तुम्हें अपने इष्ट के रूप में स्थापित किया है; तुमने ही सबसे पहले यह माया रची।

    जिस माया में बाँधकर तुम स्वयं भी निरन्तर पुकारते हो—उस बालक की अज्ञानता क्षमा करो। इस जगत की महामाया, तुम दशमहाविद्या हो। माँ से आत्मा का स्रोत-जाल प्रकट होता है; तन में मन्त्रध्वनि गूँजती है और वर्णों की यात्रा आरम्भ होती है। गुरु के आविर्भाव और पूर्ण देह में बीज-रोपण के पश्चात्, गंगाजल और गिरिराज मानो आसन पर बैठकर संकेत करते हैं; गणपति के चरणों की सुगन्ध से मस्तक सुवासित होता है। यात्रा आरम्भ हुई। खुले आकाश के नीचे चारों ओर साधक की अभयवाणी बिखरी है।

    अब आगे बढ़ो—कोलकाता से रेलगाड़ी में बैठकर, बंगाल के वीर-पुत्र ‘बिले’ को स्मरण करते हुए, साहस और उद्यम के साथ स्वयं को जानने की उत्कण्ठा में, भय के बन्धन काटकर और आत्मगौरव को अलंकार बनाकर वह रेलगाड़ी पर सवार हो गया।

    रेल की डोलती चाल में आँखें मूँद जाती हैं। स्वप्न में माँ गंगा का उद्गम उभर आता है और कानों में उनकी प्रवाह-गीत की ध्वनि गूँजती है—कल…कल…कल…कल। वे मानो कुछ कहना चाहती हैं; कितनी ही बातें अभी अनकही हैं। सोचता हूँ, कान लगाकर सुनूँ, तभी व्यवधान पड़ता है—कोई पुकारकर कहता है कि बनारस आ गया। मैं जल्दी से उतरता हूँ। चारों ओर कोलाहल और व्यर्थ की धक्का-मुक्की है। कोलाहल का व्यवधान मिटता है, और फिर डिब्बे में बैठे-बैठे ही बाबा विश्वनाथ के दर्शन हो जाते हैं।

    नावें लोगों से भरी हैं। दूर द्वीपों की शृंखला तैरती दिखाई देती है; दृश्य अत्यन्त मनोहर है। कोई हाथ के संकेत से बुला रहा है। दोनों आँखें कौंध उठती हैं—देखता हूँ, माँ गंगा के तट पर कोई ध्यानमग्न बैठा है; वह भाव-समुद्र में डुबकी लगाकर रत्न का पता पा चुका है।

    रेलगाड़ी फिर चल पड़ती है और घण्टी बज उठती है। बाबा विश्वनाथ का धाम आँखों से ओझल होने लगता है। यात्री बदलते हैं, नए लोग दिखाई देते हैं और कानों में नई आवाजें गूँजती हैं। भिन्न-भिन्न वेश में लोगों का सैलाब डिब्बे में चढ़ता है। उनमें एक व्यक्ति साधु-वेश में है—गेरुआ वस्त्र, ललाट पर चन्दन के चौड़े तिलक, कन्धे पर बड़ी-सी झोली, गले में तुलसी-माला, आयु पचास से अधिक और लम्बे बालों का जूड़ा। साधुबाबा ने सबके बीच थोड़ी-सी जगह बना ली है। रेलगाड़ी गति पकड़ती है। वे झोली से पानी की बोतल निकालकर कुछ घूँट पीते हैं और ‘हरि, हरि’ कहते हुए सिर झुकाकर प्रणाम करते हैं।

    एक यात्री साधु के हावभाव पर ध्यान दे रहा था। उनके मुख की ओर देखकर उसने अचानक पूछा—

    यात्री: कहाँ जाएँगे, बाबा?

    साधुबाबा (मृदु स्वर में): हरिद्वार।

    यात्री: क्या आप वैष्णव हैं?

    साधुबाबा: हाँ।

    यात्री: तब हरिद्वार क्यों? मथुरा या वृन्दावन क्यों नहीं?

    साधुबाबा: प्रेम में मिलती प्रेम-लीला, हरि-हर—सब उन्हीं की क्रीड़ा। मथुरा हो या वृन्दावन, हरिद्वार में भी वैष्णवी के चरण॥

    यात्री: तब इतनी दूर की यात्रा क्यों? आप वैष्णव हैं या शैव?

    साधुबाबा: दीप जलाकर देखो भाई, क्या यह ज्योति अकेली तुम्हारी? शिव ने दी अग्नि की ज्वाला, वैष्णव-घृत ने उसे सँवारा। लक्ष्य तो केवल उजियारा, कर्म-भेद से भाव हुआ न्यारा। तुम और मैं—मनुष्य कहाते, प्राणवायु को एक ही जानते। मन की पीड़ा तभी मिटेगी, हरिनाम में डुबकी लगेगी॥

    सुन्दर! अति सुन्दर! पथिक मानो मन्त्र-मुग्ध हो गए। चारों ओर केवल ‘साधु! साधु!’ की ध्वनि है। ऐसा लगता है जैसे माँ गंगा स्वयं अपने हाथों से अभिषेक कर रही हों। तिलक की पवित्र मिट्टी की सुगन्ध हवा में तैर रही है।

    समय के साथ दौड़ती रेलगाड़ी के पहिए थम गए। अब सबके रुकने की बारी थी। यात्रियों का कोलाहल फिर कानों में घना होने लगा। माँ गंगा के दर्शन होंगे—इसी विचार से सबके मन में आनन्द की लहर उठ रही थी। हरिद्वार आ गया था।

    स्टेशन के बाहर छोटी-बड़ी गाड़ियों की कतार थी और लोगों की भारी भीड़। सड़कों के किनारे अनेक बड़े होटल और धर्मशालाएँ थीं। आधुनिकता ने हरिद्वार को भी छू लिया था। यह सभी समुदायों का संगम-स्थल है और यहाँ अनेक दर्शनीय स्थान हैं। विशेष आकर्षण है ‘हर की पौड़ी’ घाट, जहाँ प्रतिदिन संध्या को बड़ी भव्यता से माँ गंगा की आरती होती है। वहाँ सामान्य जन की भी अपार भीड़ रहती है। उसी स्थान पर मनुष्य अपने संचित पाप माँ गंगा की गोद में छोड़ आने की कामना करता है।

    इसीलिए लोग भक्तिभाव से माँ गंगा में डुबकी लगाते हैं। अपनी मनोकामना को आधार बनाकर दीप जलाते हैं और माँ गंगा के प्रचण्ड प्रवाह पर उसे बहा देते हैं। वे प्रतीक्षा करते हैं कि दीप किसी तरह डूबे नहीं। ऐसी मान्यता है कि यदि दीप दूर तक तैरता दिखाई दे…

    …तो मनोकामना पूर्ण होती है।

    सन्ध्या की गंगा-आरती अत्यन्त मनोहर होती है। गंगा-तट पर कुछ युवक बड़े-बड़े दीप उठाकर माँ गंगा की वन्दना करते हैं और साथ में आधुनिक हिन्दी भजन गूँजते हैं। चारों ओर प्रकाश की जगमगाहट फैल जाती है। माँ गंगा की ओर से आती शीतल हवा गहरा सुकून देती है। अपार भीड़ के बावजूद उस समय किसी सच्चे साधु के दर्शन दुर्लभ होते हैं; साधु-सन्त अपने-अपने स्थान पर अपने आध्यात्मिक कर्म में व्यस्त रहते हैं।

    इतनी इच्छाओं के मेले से सच्चे साधु स्वयं को दूर रखना ही उचित समझते हैं। “भाव-समुद्र के तट पर बैठकर केवल समुद्र-सुख की कामना करने के बजाय, समुद्र में मिलकर दोनों तटों को छू लेने की आकांक्षा में वह स्वयं को इस मेले से अलग रखता है।” उस मिलन-साधना में प्रवृत्त होने के लिए वह गुरु-प्रदत्त मार्ग का अनुसरण करता है।

    सन्ध्या-अनुष्ठान समाप्त होने पर लोग माँ गंगा के घाट से अपने-अपने उद्देश्य की ओर चल पड़ते हैं। तभी काले वेश में एक साधु अचानक घाट पर प्रकट होता है और ऊँची आवाज में ‘व्योम! व्योम! व्योम!’ पुकारने लगता है। उसके हाथ में विशाल त्रिशूल है, सिर पर काला कपड़ा बँधा है और ललाट पर लम्बा काला तिलक। उसे देखते ही भय लगता है। वह कुछ लोगों का ध्यान खींचता है, किन्तु सबमें उसके निकट जाने का साहस नहीं। तभी एक व्यक्ति, किसी महापुरुष के प्रकट होने की आशा में, उसके चरण स्पर्श करता है।

    साधुबाबा: (‘व्योम शंकर!’ कहते हुए उसे उठाकर) तुम्हें क्या कष्ट है, बेटा?

    मध्यम आयु का व्यक्ति: बाबा, मेरे जीवन में बहुत बाधाएँ हैं। कोई भी काम सिद्ध नहीं होता। मुझे आशीर्वाद दीजिए, ताकि मेरे सभी कार्य सिद्ध हों। वह अच्छी-खासी दक्षिणा देता है। बाबा प्रसन्न होकर त्रिशूल को छूते हुए कहते हैं—

    साधुबाबा: तुम्हारे सभी काम सिद्ध होंगे। जाओ बेटा, तुम्हारे सारे काम पूरे होंगे। अब कोई भय नहीं।

    एक दूसरा आत्मविस्मृत युवक बाबा की गतिविधियाँ देख रहा था। वह गुरु की खोज में हरिद्वार आया था। गुरु को पहचानने की आकांक्षा से उसने पूछ लिया—

    युवक: बाबा, क्या आप श्मशानचारी अघोरी हैं?

    बाबा: (‘व्योम शंकर!’ कहकर हँसते हुए) नहीं रे बेटा, मैं केवल श्मशानचारी नहीं हूँ; मैं हर स्थान पर विद्यमान रहता हूँ। लोगों का दुःख-दुर्दशा दूर करना ही मेरा व्रत है। साधना में सिद्धि प्राप्त करके मैं मार्ग-मार्ग भटकता हूँ और अभागों को आशीर्वाद देकर उनका भाग्य बदल देता हूँ। बता, तुम्हें क्या कष्ट है? मेरे इस त्रिशूल के स्पर्श से वह अभी भस्म हो जाएगा।

    युवक: पर मैंने तो सुना है कि सिद्ध साधक के दर्शन दुर्लभ होते हैं और बहुत पुण्य के फल से ही उनका साक्षात्कार मिलता है। वास्तव में, बाबा, मुझे कोई कष्ट नहीं है। मैं इस जागतिक मोह से मुक्त होना चाहता हूँ।

    इस बार बाबा ‘व्योम शंकर!’ कहकर, बिना कोई उत्तर दिए, वहाँ से चल पड़ता है। वह ठग बाबा अब किसी और का ध्यान आकर्षित करने की इच्छा में आगे बढ़ जाता है।

    यही संसार का नाम, साधु-वेश में लाज कहाँ। माँ गंगा, निहारो ज़रा, कितने ठग, कितने रंग यहाँ। क्यों रचते हो ऐसा खेल? दो दिन में सुध-बुध खोओगे; जब आएगी तुम्हारी नाव, नरक की ज्वाला जानोगे। इस भव में यही है खेल— गुरु-वेश में ठगों का मेला॥

    आत्मविस्मृत युवक आगे बढ़ता है। मन में अदम्य इच्छा है—उसे सद्गुरु के दर्शन चाहिए। वह ‘हर की पौड़ी’ घाट छोड़कर सड़क पर आ जाता है। संध्या के समय मार्ग प्रकाश से सज उठे हैं और छोटी-बड़ी दुकानों के सामने भारी भीड़ उमड़ रही है। युवक इधर-उधर देखते हुए, संध्या के वातावरण और लोगों की भीड़ के बीच, चाय की प्यास बुझाने के लिए एक छोटी-सी दुकान पर रुक जाता है। वहीं उसकी भेंट एक विद्वान पण्डित से होती है।

    वह अपने पाण्डित्य और स्मृति के भण्डार से हरिद्वार की पौराणिक कथाएँ सुनाने लगता है। वह माँ गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की कथा कहता है—किस राजवंश के भगीरथ ने कितने वर्षों तक कैसी कठोर तपस्या करके माँ गंगा को धरती पर उतारा; और जब माँ गंगा के अदम्य वेग से मृत्युलोक डूबने लगा, तब देवाधिदेव ने उन्हें अपनी जटाओं में बाँधकर उनके प्रवाह का एक अंश पृथ्वी पर छोड़ा। उनके अमृतमय रस से समस्त जीव-जगत प्राणवान हुआ।

    हिमशीतल ऊँची धाराओं से उतरकर माँ गंगा इसी हरिद्वार में समतल भूमि पर पदार्पण करती हैं और संगम की ओर प्रवाहित होती हैं। दसों दिशाओं की होत्री बनकर वे यहाँ मृत्युलोक की देवी दुर्गा के रूप में विराजती हैं। पण्डित माँ गंगा के सात धाराओं में विभक्त होने, सप्तर्षियों की तपस्या, प्रजापति दक्ष के यज्ञ, सती के प्राण-त्याग और इक्यावन शक्तिपीठों की उत्पत्ति की कथाएँ सुनाता है—इन सबका सम्बन्ध हरिद्वार से है। वह अनेक अज्ञात तथ्यों और मार्गों तथा कुम्भ मेले में साधु-संन्यासियों के समागम का वर्णन करता है। देवभूमि का द्वार इसी हरिद्वार से खुलता है।

    न जाने कितने तान्त्रिक अपने कर्मों की सिद्धि की आकांक्षा लेकर यहाँ आते हैं। वे पर्वतों, वनों, जंगलों और गुफाओं में घूमते हुए अपने आसन और आश्रय बनाते हैं। साधना में सिद्ध होने की आशा से कुटीर-जीवन अपनाते हैं; इन्द्रियों के नियन्ता बनकर साधना के महोत्सव में प्रवृत्त होते हैं; अपनी क्रिया से पत्थर में प्राण-प्रतिष्ठा करते हैं और अपने ही जगत में आत्ममग्न रहते हैं।

    युवक: किन्तु ऐसे साधकों के दर्शन मुझे कहाँ होंगे? अपनी समस्त आकांक्षाओं की उन्मत्तता में ही तो मैं दौड़ा आया हूँ। मुझ पर दया कीजिए और अभी बताइए कि उनसे कहाँ भेंट हो सकती है। पण्डित: मैं एक ऐसे तान्त्रिक को जानता हूँ, जिनका कोई साधु-वेश नहीं है। वे पौराणिक कथाओं का प्रदर्शन नहीं करते; उनकी सहज-सरल बातों में जीवन-दर्शन मिलता है। मन-ही-मन मैंने उन्हीं को अपना गुरु मान लिया है।

    उनकी सत्यदृष्टि के सामने मस्तक स्वयं झुक जाता है; सत्य की तीव्रता में पाप मानो भस्म हो जाते हैं। युवक: क्यों, आपको मन्त्र-दीक्षा नहीं मिली? पण्डित: नहीं, अभी तक नहीं। बहुत अनुरोध करने पर भी अनुमति नहीं मिली। युवक: तो क्या वे दीक्षा प्रदान नहीं करते?

    पण्डित: करते हैं। उनके कुछ ही शिष्य हैं। वे गुरु के सम्मुख देवता को भी अलग से प्रणाम नहीं करते, क्योंकि उनका विश्वास है कि समस्त तीर्थ और सम्पूर्ण देवत्व उन्हीं में विद्यमान हैं। उनके चरण स्पर्श करके मनुष्य देवत्व का आस्वाद पाता है। मनुष्य होकर मनुष्यों की पूजा ग्रहण करने वाला वह व्यक्ति वीरभाव से आशीर्वाद देता है और शिष्यों को साधना-पथ पर अग्रसर करता है। वह समझाता है कि ब्रह्माण्ड के ज्ञानस्वरूप गुरु ही अन्धत्व दूर करते हैं; अन्धत्व मिटते ही प्रकाश के दर्शन होते हैं।

    विश्वास का यही नाम— भक्ति से भरी गंगा। ज्ञान-विहीन मनुष्य भी ब्रह्माण्ड का स्वरूप पाए। शिव-शक्ति का मिलन-स्थान, गुरु-नाम में मन और प्राण। युवक: तब चलिए, मुझे भी अपने साथ ले चलिए। मैं भी उनके दर्शन करना चाहता हूँ।

    पण्डित: उनका ठिकाना पाना ही बहुत कठिन है। सप्तधारा के तट पर, जंगल के बीच, एक छोटी-सी कुटिया अवश्य है; किन्तु वहाँ भी हर समय उनके दर्शन नहीं होते। दिन-रात बार-बार प्रयास करने पर भी…

    …वे पकड़ में नहीं आते। प्रतीक्षा करो; सम्भव है कि इस पूर्णिमा को तुम्हें गुरु-वरण का सौभाग्य मिले और मेरी गुरु-पूर्णिमा भी आरम्भ हो। बातों-बातों में रात बहुत हो गई। कल मैं तुम्हें सप्तधारा के उसी तट पर ले जाऊँगा; शायद उनके दर्शन मिल जाएँ। आज मैं चलता हूँ। युवक का उत्साह और बढ़ जाता है। वह तो उसी क्षण उनके दर्शन के लिए दौड़ पड़ना चाहता है।

    दोनों की मित्रता मानो स्वीकार हो जाती है। कल फिर भेंट होगी; यदि गुरु के दर्शन मिले तो पथ-यात्रा आरम्भ होगी। आशा के प्रकाश से मन बाँधकर अब केवल रात पार करनी है। प्रातः शायद वह गुरु की कितनी ही बातें सुनेगा। आँखों से देखे बिना भी उसे लगता है मानो गुरु मिल चुके हों, मानो गुरु-प्राप्ति हो गई हो। रात का भोजन करके वह बिस्तर पर लेटा न जाने कितनी बातें सोचता रहता है। उल्लास और आकुलता में जागते हुए रात बीतती है और ब्राह्ममुहूर्त में ही वह उठ बैठता है। शायद उसका मित्र बाहर प्रतीक्षा कर रहा होगा, उसे गुरु-दर्शन के लिए ले जाने को।

    वह मार्ग पर निकल पड़ता है और दौड़कर माँ गंगा के तट पर पहुँचता है। अभी अन्धकार छँटा नहीं है। रास्तों पर धुँधलापन है और कानों में गुरु-स्तोत्रों का पाठ तैरता हुआ आता है; देवभूमि की महिमा में गुरु-वन्दना का रस मिलता है। वह मन-ही-मन गुरु और माँ गंगा को प्रणाम करता है। आकाश अभी आगमन का शृंगार कर रहा है—मानो घूँघट ओढ़ी नववधू लज्जा से अरुण हो उठी हो। इस मनोहर वातावरण में प्रकृति के अनुपम रूप का नवजागरण होता है। वहाँ एक संन्यासी है—लम्बा, दुबला-पतला शरीर, आयु पचास से अधिक और चेहरे पर बड़ी खिचड़ी दाढ़ी।

    सिर के दोनों ओर से विशेष प्रकार की वेणी-जटाएँ नीचे उतर रही हैं…

    …घुटनों तक उतर आई हैं। गले और कलाई में रुद्राक्ष-मालाएँ हैं; ललाट पर लाल सिन्दूर की गोल बिन्दी; शरीर पर सफेद धोती और नंगे ऊपरी तन पर सफेद उत्तरीय लिपटा है। प्रातःकृत्य समाप्त करके वह घाट पर बैठा आकाश की ओर इस प्रकार देख रहा है, मानो आकाश में विलीन हो जाना चाहता हो, उड़ते बादलों के साथ स्वयं को बहा देना चाहता हो। उसकी निर्मल दृष्टि से उसके अन्तर्भाव का अनुमान होता है। साधु-संग की आशा में युवक संन्यासी के निकट जाता है, प्रणाम करके उनके पास बैठ जाता है। संन्यासी की दृष्टि युवक पर पड़ती है।

    संन्यासी: बेटा, मुझसे क्या चाहते हो? युवक: कुछ नहीं, केवल थोड़ा-सा आशीर्वाद। संन्यासी (ठहाका लगाकर): वही तो जीवन की अमूल्य सम्पदा है। उससे बड़ी और कौन-सी वस्तु माँगी जा सकती है? युवक: किन्तु बाबाजी, मैं अपना सब कुछ छोड़कर आया हूँ; अब लेने को मेरे पास कुछ और नहीं। आप लोगों के आशीर्वाद के बिना मैं अपने लक्ष्य तक कैसे पहुँचूँगा? संन्यासी: तुम्हारा लक्ष्य क्या है, बेटा? युवक: मैं ईश्वर को जानना चाहता हूँ। मैं उनका दास बनना चाहता हूँ।

    युवक: दूसरों की दासता छोड़कर मैं उसी का सेवक बनना चाहता हूँ जिसका यह जगत है। इसलिए आशीर्वाद की भिक्षा माँगकर अपने लक्ष्य तक पहुँचना चाहता हूँ। संन्यासी (मन्द मुस्कान के साथ): भिक्षा माँगने से अन्न मिलता है; आशीर्वाद कर्म करने पर मिलता है। अतः इस मार्ग के कर्म की आवश्यकता है। युवक: परन्तु बाबाजी, मुझे नहीं मालूम कि मेरा उचित कर्म क्या है। फिर भी मैं प्रतिदिन प्रातः और सन्ध्या देवी-देवताओं के स्तोत्र पढ़ता हूँ और भक्तिभाव से माँ गंगा की स्तुति करता हूँ।

    संन्यासी: वाह! बहुत अच्छा। किन्तु बेटा, कर्मस्थल के बाहर बैठकर काम करने से क्या वेतन घर आता है? पहले कर्मस्थल के भीतर प्रवेश करना होगा; फिर स्वामी द्वारा निर्धारित कार्य करना होगा—तभी वेतन की आशा की जा सकती है। लक्ष्य की ओर चलने के लिए मार्ग का संकेत चाहिए, नहीं तो भटकते-भटकते लक्ष्य से दूर हो जाओगे। जैसे अन्धकार में चलने के लिए प्रकाश आवश्यक है, वैसे ही इस पथ पर गुरु के बिना किया कर्म निष्फल होता है।

    संन्यासी: जितना मार्ग मुझे दिखाना था, दिखा दिया। अब उसकी खोज करो जो तुम्हारे लिए इस पथ का द्वार खोल देगा। अब मैं चलता हूँ; मेरी प्रातः-सन्ध्या का समय हो गया है। युवक: बाबाजी, क्या आप यहीं रहते हैं? संन्यासी: नहीं। हम संन्यासियों का कोई निश्चित स्थान नहीं होता। घूमते हुए अपना डेरा बनाते हैं—आज यहाँ, कल कहीं और। युवक: बाबाजी, आपने किस मत में संन्यास लिया है? संन्यासी: मत! बेटा, सभी मत अन्ततः एक ही हैं। मार्ग अनेक हैं, पर घूम-फिरकर सभी उसी एक सत्य को स्वीकारते हैं।

    “मार्गों के संकेत अनेक, सभी मत ब्रह्म को मानें। साकार से निराकार प्रकटे, भेद-बुद्धि अपना पथ चुने।” (युवक को आश्वस्त करते हुए) तुम्हें गुरु अवश्य मिलेंगे। ईश्वर सबको पुकारते हैं; केवल थोड़ा स्थिर हो जाओ तो उनकी पुकार सुनाई देती है। अब मैं चलता हूँ, बेटा। यदि तुम इस पथ पर बने रहे तो फिर इसी मार्ग पर भेंट हो जाएगी और बहुत-सी बातें होंगी। इस राह पर सहयात्री की बड़ी कमी है। युवक: बाबाजी, हम अवश्य फिर मिलेंगे। मैं भी दुःख का यह…

    …बोझ उतारना चाहता हूँ। जब आपके दर्शन हो ही गए हैं तो मुझे भिक्षा की झोली दे दीजिए। संन्यासी: नहीं, नहीं बेटा, मैं वह नहीं हूँ। ‘गुरु’ बहुत बड़ा शब्द है। वे आएँगे; समय होने पर तुम्हें दर्शन देंगे। संन्यासी आगे बढ़ जाते हैं; उनके बहुत-से कार्य अभी शेष हैं। युवक चारों ओर देखता है—काफी समय बीत चुका है। रास्तों पर उजला प्रकाश फैल गया है और माँ गंगा के घाट पर लोगों का आवागमन आरम्भ हो गया है। इतनी देर में क्या हो गया? भाव अभी भी उसे जकड़े हुए है।

    वह थोड़ा आगे बढ़कर पक्के घाट की सीढ़ियों से नीचे उतरता है। गंगा के उल्लासपूर्ण वेग से बहते शीतल जल को दोनों हथेलियों में भरकर चेहरे और आँखों पर छींटे मारता है। ठण्डे जल के स्पर्श से शरीर को शान्ति मिलती है, किन्तु मन का बोझ वैसा ही बना रहता है। चाय की तलब मिटाने के लिए युवक सड़क पर लौट आता है। पास ही एक चाय की दुकान है, जहाँ चूल्हे पर दूध अभी-अभी उबलने लगा है।

    युवक चाय की दुकान पर उपस्थित सज्जन से एक प्याली चाय माँगता है। दो और व्यक्ति आकर पास खड़े हो जाते हैं। युवक बाबाजी की बातें सोचता रहता है—कितनी भूलों को सत्य मानकर हम अपने अहंभाव को बढ़ाते रहते हैं! अपने ही मिथ्या महलों में स्वयं शासन करते हैं और केवल कुछ पुस्तकें पढ़कर ईश्वर का भी न्याय करने बैठ जाते हैं। अचानक उसे अपने मित्र और उसका वचन याद आता है। अरे, वह कहाँ है? बहुत देर हो गई; न जाने कितनी दूर जाना होगा। आखिर वह है कहाँ?

    कल उसने कहा था कि वह इस व्याकुल युवक को उस गुरु के दर्शन कराने ले जाएगा। युवक इधर-उधर देखता है; शायद वह अभी तक नहीं आया। थोड़ा आगे बढ़ने पर दिखाई देता है—“वह रहा! सड़क के एक ओर खड़ा है।” उसने काली पतलून और आसमानी रंग की पूरी बाँहों वाली कमीज पहन रखी है…

    …कमीज है, आँखों पर चश्मा; आयु लगभग पचपन-छप्पन वर्ष। युवक लम्बे डग भरता हुआ तेजी से उसके पास जाता है। युवक: अरे मित्र, कितनी देर से खड़े हो? पण्डित: अभी-अभी आया हूँ, बस अभी उतरकर खड़ा हुआ हूँ। युवक: इतनी देर क्यों? मैं तो बहुत समय से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ। पण्डित: नहीं भाई, घर में बहुत काम रहता है, इसलिए थोड़ी देर हो गई। चलो, बस पकड़नी है; यहाँ से काफी दूर जाना होगा। बस-अड्डा पास ही है। दोनों जल्दी से बस में चढ़ जाते हैं।

    वे पास-पास की दो अच्छी सीटें चुन लेते हैं। कुछ यात्री इधर-उधर बैठे हैं; बस में अधिक भीड़ नहीं है। पण्डित: लगभग दो घण्टे का मार्ग है। इस बीच बातें करके तुम्हारे साथ मित्रता और पक्की हो जाएगी। युवक: मित्र, तुम्हारे घर में कौन-कौन हैं? पण्डित: हमारे परिवार में तीन लोग हैं—मैं, मेरी पत्नी और मेरा बेटा। कुछ समय से मेरी पत्नी बहुत बीमार है। उसके हाथ-पैरों में ठीक से शक्ति नहीं रहती; थोड़ा-सा काम करते ही साँस फूलने लगती है।

    पण्डित: न जाने कितने डॉक्टरों और वैद्यों को दिखाया। पता नहीं किस रोग ने उसे जकड़ लिया है; अब कोई दवा काम नहीं करती। अन्त में—कहते हुए लज्जा आती है—हमने मनोचिकित्सक को भी दिखाया, पर उससे भी कोई लाभ नहीं हुआ। मेरी पत्नी बहुत अच्छी है और बहुत प्रयास करती है, किन्तु शरीर साथ नहीं देता। अब मैं समझता हूँ कि यह उसी स्त्री का किया हुआ है; इसीलिए डॉक्टर की दवा असर नहीं करती। युवक: किसका किया हुआ? कौन है वह स्त्री?

    पण्डित: हम कुछ मित्र मिलकर पर्वतारोहण के लिए जाया करते थे। वहीं अनुराग और रेवा से परिचय हुआ। रेवा, अनुराग की…

    …सम्बन्ध का शब्द मूल में अस्पष्ट है। दो वर्ष पहले हम सब मिलकर रूपकुण्ड ट्रेक पर गए थे। मेरी पत्नी और बेटा भी साथ गए। रेवा का शरीर सुगठित था, फिर भी उसमें अधिक जीवनी-शक्ति नहीं थी; साँस फूलते रहने पर भी उसे पहाड़ चढ़ना अच्छा लगता था। उस बार ट्रेक सात दिनों का था। पत्नी और बेटे के साथ मैंने अन्य साथियों के बीच कुल दस दिन बिताए।

    अनुराग हमारे साथ बहुत घुल-मिल गया। बातचीत के दौरान रेवा ने हमें अपने एक भाई के बारे में बताया। उसके अनुसार वह बहुत बड़ा तान्त्रिक और ज्योतिषी था; उसका नाम और प्रसिद्धि भी बहुत थी और धन भी अपार था।

    ऐसा कोई काम नहीं था जो वह न कर सकता हो; धन के बदले वह किसी भी समस्या का समाधान कर देता था। उसके भाई की ये बातें सुनकर हमने भी एक बार उससे मिलने की इच्छा प्रकट की। ट्रेक से लौटने पर रेवा ने किसी दिन उससे भेंट कराने का वचन दिया और फिर एक दिन निश्चित हो गया। हमारे बेटे की आयु उस समय उन्नीस वर्ष थी। उसने अच्छे स्थान के साथ विद्यालय की सीमा पार की थी और मेरी पत्नी अत्यन्त प्रसन्न थी। हम भी बेटे की भावी सफलता की कुंजी जानने के लिए उत्सुक थे।

    शायद एक उच्च जीवन बेटे को संकेत दे रहा था। उसके मार्ग में कोई बाधा न आए—इसी आशा से उत्साह, भक्ति और विश्वास लेकर हम सुबह-सुबह उस तान्त्रिक भाई के पास पहुँचे। वह व्यस्त व्यक्ति था और वहाँ बहुत लोग थे। अनुराग और रेवा के साथ हम भीतर गए। कमरे में प्रवेश करते ही रेवा ने भाई से हमारा परिचय कराया। उसने मुस्कराकर हमें बगल वाले कमरे में बैठने को कहा। इस अवसर पर रेवा ने अपने भाई की कुछ और प्रशंसा कर दी।

    कमरा महँगी वस्तुओं से सुसज्जित और सुव्यवस्थित था। फर्नीचर भी बड़े करीने से रखा था। स्पष्ट था कि उसका व्यवसाय खूब फल-फूल रहा था।

    भाई की आयु अधिक नहीं थी, फिर भी उसमें बाबाओं जैसी बनावट खूब थी। उसने महँगा लाल वस्त्र पहन रखा था; गले में बड़े-बड़े रुद्राक्षों की माला और ललाट पर लाल तिलक था। भारी देह के कारण वह अपनी आयु से अधिक बड़ा दिखाई देता था। उसका रूप-वेश कुछ भय उत्पन्न करता था। तान्त्रिक भाई बड़ी मुस्कान के साथ हमारे पास आया और सोफे पर बैठ गया। हमने हाथ जोड़कर प्रणाम किया; बेटे ने उठकर उसके चरण छुए। उसने बेटे को सामने बैठने को कहा। तान्त्रिक: तुम्हारा नाम? लड़का: अनिमेष बनर्जी।

    तान्त्रिक: अनिमेष, तुम्हारे हाथ की रेखाएँ देखूँ। (आवर्धक काँच से दोनों हथेलियों की रेखाएँ ध्यानपूर्वक देखकर) हाँ, उच्च शिक्षा का योग दिखाई देता है। अच्छी प्रतिष्ठा प्राप्त करने की रेखा भी स्पष्ट है। पत्नी (मुस्कराकर): अच्छा? और विवाह? वह भी ठीक होगा न? कहीं स्वयं ही विवाह तो नहीं कर लेगा? तान्त्रिक: नहीं, नहीं। आपका बेटा आजकल के लड़के-लड़कियों जैसा नहीं है। वह भद्र और शिष्ट है, भगवान में विश्वास रखता है; सब कुछ आपकी इच्छा के अनुसार होगा।

    तान्त्रिक: किन्तु एक समस्या है… (वह हाथ को और ध्यान से देखता है, फिर ललाट पर कुछ देखने लगता ठीक है, बाद में बताऊँगा। पत्नी (अत्यन्त उत्सुक होकर): क्यों, कोई समस्या दिखाई दी? तान्त्रिक (चेहरा गम्भीर करके): हाँ। उसके ललाट की रेखा में एक बहुत बड़ा संकट दिखाई दे रहा है। पण्डित और पत्नी (भयभीत होकर एक साथ): कैसा संकट? तान्त्रिक: शेष सब ठीक होने पर भी अनिमेष की आयु बहुत कम दिखाई देती है। अर्थात पच्चीस वर्ष की आयु में उस पर मृत्यु का संकट है—यह एकदम स्पष्ट है।

    पत्नी (भयभीत होकर): आप क्या कह रहे हैं? मेरा इकलौता बेटा! तान्त्रिक (उसे आश्वस्त करते हुए): नहीं, नहीं, आपको इतना चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं। हर बात का उपाय होता है। मानव-कल्याण के लिए ही मैंने महामृत्युञ्जय मन्त्र में सिद्धि प्राप्त की है। एक कवच से उसका संकट काट दूँगा। किन्तु मृत्यु-संकट साधारण बात नहीं है; एक होम भी करना होगा। होम और कवच के अनुष्ठान में काफी धन लगेगा। पण्डित: लगभग कितना खर्च होगा?

    तान्त्रिक: देखिए, आप लोग मेरी प्रिय दीदी के साथ आए हैं, इसलिए मुझे पारिश्रमिक के रूप में अधिक कुछ नहीं देना होगा—केवल एक सौ रुपये पर्याप्त हैं। किन्तु पूजा का खर्च आपको देना पड़ेगा। घी, लकड़ी, मधु और कवच मिलाकर लगभग चालीस हजार रुपये लगेंगे। इससे कम में यह संकट नहीं काटा जा सकता।

    पण्डित: यह सुनकर मैं भी बहुत डर गया। उस समय मेरा मस्तिष्क काम नहीं कर रहा था—इकलौता बेटा, और उस पर मृत्यु का संकट! किसी से परामर्श करने या देर करने का साहस नहीं हुआ। इसलिए मैं तुरन्त सहमत हो गया, एक हजार रुपये अग्रिम दिए और हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि वह मेरे बेटे का संकट दूर कर दे।

    उसने मेरा हाथ पकड़कर शत-प्रतिशत सफलता का आश्वासन दिया और कहा, “ऐसा काम मैं पहले भी अनेक बार कर चुका हूँ। अधिक देर मत कीजिए; शेष धन की व्यवस्था करके शीघ्र दे जाइए।” मेरी पत्नी ने कहा, “मैं कल ही बाकी रुपये रेवा के हाथ भेज दूँगी। आप कृपया कार्य आरम्भ कीजिए।”

    इसके बाद हम भारी मन से घर लौटे। हम दोनों बहुत चिन्तित थे। अनिमेष ने मुँह से अधिक कुछ नहीं कहा, किन्तु उसका व्यवहार बदल गया। अपने ऊपर मृत्यु का संकट जानकर उसने मानो भविष्य की सारी आशाएँ छोड़ दीं। वह बाहर निकलना नहीं चाहता था, मित्रों से दूर होकर अकेला रहने लगा और लगभग खाना-पीना भी छोड़ दिया। कोई बात कहने पर वह भयभीत हो जाता; मानसिक रूप से वह पूरी तरह टूट गया।

    हमने शीघ्र ही धन रेवा के हाथ दे दिया। तीन दिनों के भीतर वह कवच लेकर आ पहुँची। उसने कहा कि इतनी व्यस्तता के बावजूद उसके भाई ने सबका काम छोड़कर हमारा काम पहले किया है। उसने लाल धागे में ताबीज बाँधकर बेटे के गले में डालते हुए कहा, “अब यम भी यह द्वार नहीं तोड़ पाएगा।” किन्तु बेटा वैसे ही गुमसुम रहा। वह न कॉलेज जाता, न बाहर निकलता। कुछ कहने पर उत्तर देता कि पच्चीस वर्ष की आयु पार करने के बाद ही सब कुछ फिर शुरू करेगा।

    उसने पढ़ाई छोड़ दी और पूरी तरह घर बैठ गया। उसके व्यवहार को देखकर पत्नी और मैं उसके भविष्य के लिए चिन्तित हुए। उसकी मानसिक अवस्था तुरन्त बदलने की आशा में हम फिर रेवा की शरण में गए। सब सुनकर रेवा ने अपने भाई से बात की। उसके भाई ने कहा कि इस क्रिया के प्रभाव से मुक्त करने के लिए एक और मादुली चाहिए और उसने दस हजार रुपये और माँगे। वह मादुली पहनाने पर भी बेटे में कोई परिवर्तन नहीं आया, इसलिए मेरी पत्नी बार-बार रेवा को इसकी सूचना देती रही।

    रेवा उसे आश्वस्त करती रही—“सब ठीक हो जाएगा।” इसी प्रकार कई दिन बीत गए। जब मेरी पत्नी ने फिर बताया कि कोई लाभ नहीं हुआ, तभी उनका व्यवहार बदल गया…

    …उन्होंने मेरी पत्नी को झूठी कहकर अपमानित किया। उनका कहना था कि रेवा का सिद्धपुरुष भाई जो भी करता है, कभी निष्फल नहीं होता। परिणाम यह है कि मेरा बेटा आज भी लगभग विक्षिप्त व्यक्ति की तरह जीवन बिता रहा है। पत्नी से विवाद होने पर रेवा के तान्त्रिक भाई ने धमकी दी कि वह ‘मारण-बाण’ से मेरी पत्नी को समाप्त कर देगा। उसके कुछ दिनों बाद मेरी पत्नी सचमुच बीमार पड़ गई। फिर हमने अनेक डॉक्टरों और तान्त्रिकों से उपचार कराया, पर कोई लाभ नहीं हुआ।

    जिस तान्त्रिक के पास भी गया, उसने केवल धन लिया और स्वयं को महान सिद्ध साधक बताया; वास्तविक सहायता किसी ने नहीं की। जब मैं सारी आशा छोड़ चुका था, तभी मेरे एक विश्वस्त मित्र ने उन गुरु का नाम बताया। इतनी ठगी के बाद मेरा किसी पर विश्वास नहीं रहा था। मित्र के बार-बार आग्रह करने पर मैं जाने के लिए तैयार हुआ, किन्तु उनसे मिल पाना बहुत कठिन था। वे इन बातों का व्यवसाय नहीं करते।

    इसीलिए उनसे मिलने का कोई निश्चित स्थान या समय नहीं था। फिर भी दो बार उनसे भेंट हुई, किन्तु इस विषय में कुछ कहने का अवसर नहीं मिला—और न जाने क्यों, उन्हें बताने की मेरी बहुत इच्छा भी नहीं हुई। युवक: लेकिन क्यों? तुम तो उन्हें यही बात बताने गए थे। पण्डित: नहीं जानता।

    किन्तु उनकी बातें सुनते ही गहरी शान्ति मिलती है। उनसे जानने के लिए शायद बहुत कुछ है; जितना थोड़ा समय उनके साथ मिलता है, उनकी बातें सुनते-सुनते ही बीत जाता है। एक बार पत्नी और मैं दोनों उनसे मिले और पति-पत्नी के रूप में दीक्षा लेने की इच्छा भी बताई। उन्होंने कहा, “होगा, होगा। सम्पर्क बनाए रखो; समय आने पर मिल जाएगा। किसी को गुरु बनाने से पहले गुरु की भलीभाँति परीक्षा करनी चाहिए, और इसी अवधि में गुरु भी शिष्य को…”

    “…और इसी बीच गुरु भी शिष्य को पहचान लेंगे। किसान मिट्टी को समझकर ही उसमें बीज बिखेरता है; पथरीली भूमि में धान तो नहीं उगेगा”—यह कहकर वे थोड़ा मुस्कराते थे। “अच्छा, अब इन बातों को छोड़ो। थोड़ी देर में हमें उतरना है। उस छोटी-सी दुकान के सामने उतरेंगे। चलो, उठें।” बस से उतरकर दोनों दुकान के पास से होते हुए जंगल की ओर जाने वाले सँकरे कच्चे मार्ग पर चल पड़ते हैं। कुछ दूर आगे बढ़ते ही रास्ता और सँकरा होने लगता है। बड़े-छोटे वृक्षों से घिरा जंगल क्रमशः अधिक सघन होता जाता है।

    लोगों का आवागमन बहुत कम है, फिर भी अपने ही पदचाप की ध्वनि से ऐसा लगता है मानो बहुत-से लोग साथ चल रहे हों। लगभग पन्द्रह मिनट चलने के बाद कुटिया दिखाई देती है। विशाल वृक्षों से घिरे जंगल में खर-पतवार काटकर बनाया गया मिट्टी का आँगन बहुत स्वच्छ है। प्रवेश पर बाँस की पतली खपच्चियों का छोटा-सा फाटक है। भीतर का भाग साफ-सुथरा और चारों ओर बड़े वृक्षों से घिरा है। एक छत वाली कुटिया के सामने बड़ा बरामदा है; भीतर सम्भवतः एक ही बड़ा कक्ष है। वह मिट्टी, बाँस, होगला के पत्तों और वृक्षों के मोटे तनों से बनी है।

    कक्ष का द्वार होगला और बाँस की खपच्चियों से बना है तथा कुटिया की छत टिन की है। कुटिया देखते ही दोनों के मन उल्लास से भर उठते हैं। वे तेज कदमों से भीतर आते हैं और कुटिया के सामने खुले स्थान पर खड़े होकर उसकी ओर प्रणाम करते हैं।

    उनके आने से सूखे पत्तों की जो ध्वनि होती है, उसे सुनकर कमरे से एक मध्यम आयु का सज्जन और उनके साथ एक महिला बाहर आते हैं। सज्जन ने पाजामा और फतुआ पहना है। महिला लाल किनारी वाली सफेद साड़ी में हैं; ललाट पर बड़ी लाल बिन्दी और माँग में चौड़ा सिन्दूर है। समय लगभग ग्यारह बजे का होगा। सज्जन (दोनों को देखकर): आप लोग कौन हैं?

    दोनों (एक साथ): हम गुरुजी से मिलने आए थे। क्या वे अभी यहाँ हैं? महिला: वे आज प्रातः ही नगर में एक शिष्य के घर गए हैं, पर कल सुबह लौट आएँगे। आप लोग यहाँ बैठिए। (वह भूमि पर चटाई बिछा देती लगता है, आप बहुत दूर से आए हैं? पण्डित: हाँ, उनसे मिलने की बड़ी इच्छा थी, इसलिए हम सुबह-सुबह निकल पड़े। युवक: क्या आप लोग यहीं रहते हैं?

    महिला: नहीं, नहीं। पागलाबाबा—अर्थात हमारे गुरुदेव—ने आज हमें यहीं रात बिताने का आदेश दिया है। युवक: पागलाबाबा? सज्जन: वास्तव में हम सभी उन्हें पागलाबाबा ही… महिला: उनका कोई ठिकाना नहीं—कब क्या करेंगे, समझना कठिन है। इसलिए आपस में हँसी-मजाक में हमने उनका नाम ‘पागलाबाबा’ रख दिया है। किन्तु उनके सामने इस नाम से नहीं पुकारते। युवक: वे कल कब लौटेंगे? सज्जन: यह कहना बहुत कठिन है। लगता है, सुबह लौट आएँगे। युवक: अच्छा भाभीजी, क्या आप दोनों भी उनके शिष्य हैं? क्या आपने भी दीक्षा ली है?

    युवक: क्या तन्त्र-मत के अनुसार? महिला: हाँ। मुझे इस पथ पर चार वर्ष हो गए हैं और ये मुझसे एक वर्ष अधिक पुराने हैं। आप लोग बातें कीजिए; मैं चावल चढ़ा देती हूँ। दोपहर में कुछ तो खाना होगा। युवक: नहीं, आप क्यों कष्ट करेंगी? हम बाहर कुछ खा लेंगे।

    भाभीजी: यदि मेरे इस कष्ट का विचार करोगे तो तुम्हें भूखा ही रहना पड़ेगा, क्योंकि यहाँ आसपास कोई होटल या भोजनालय नहीं है। हमारे गुरुदेव जाते समय कह गए हैं, “यदि कोई आए तो उसे भूखा मत रखना।” शायद उन्होंने आप लोगों के विषय में सोचकर ही ऐसा कहा हो। आज सुबह वे स्वयं मछली लेकर आए थे और बोले, “आज मछली पकाना और इन सब मछलियों का एक झोल बना लेना।” आप लोग बातें कीजिए, मैं चलती हूँ।

    भाभीजी: भोजन बहुत अच्छा न भी बने, फिर भी दोपहर में दो कौर अन्न ग्रहण कर सकोगे। (भाभीजी उठकर चली जाती युवक: मित्र, देवालय में भोग ग्रहण करने का निमन्त्रण—यह तो हमारा सौभाग्य है! पण्डित: क्या इस जंगल में किसी और की भी कुटिया है? दादा: हाँ, हमारी कुटिया के पीछे सीताराम बाबा की कुटिया है। वे अधिक बाहर नहीं निकलते; आयु बहुत हो गई है। युवक: अच्छा, इस घने जंगल में जीव-जन्तुओं से भय नहीं लगता? यहाँ शायद बिजली भी नहीं है।

    दादा: नहीं, बिजली नहीं है; किन्तु जीव-जन्तु बहुत हैं। अब हमें उनसे विशेष भय नहीं लगता। यह छोटा-सा फाटक और ये विशाल वृक्ष रात में प्रहरी बनकर खड़े रहते हैं। हमारे पागलाबाबा कहते हैं, “मनुष्य-रूपी पशु से ये अबोध पशु कहीं अच्छे हैं। वे केवल जीवित रहने की आवश्यकता से शिकार करते हैं, अपना शौक पूरा करने के लिए नहीं। यदि उन्हें थोड़ा प्रेम दिया जाए और पेट की ज्वाला शान्त कर दी जाए, तो वे पालतू बनकर अपने पालक की रक्षा भी करते हैं। इसलिए साधक उनसे डरे नहीं; उन्हें उचित कार्य में लगाकर…”

    “…वे पथभ्रष्ट मनुष्यों से आने वाली बाधाओं को रोक सकते हैं और साधक निर्जनता में अपनी साधना कर सकता है।” युवक: क्या वे यहीं पूजा-अर्चना करते हैं?

    दादा: हाँ, आइए, कमरे के भीतर। यह उनका विश्राम-स्थान है—मध्यम आकार का लकड़ी का तख्त; उस पर पत्तों की चटाई, दो तकिए, तह किया हुआ एक कम्बल और एक चादर। कमरे का फर्श भी मिट्टी का है। एक ओर उनका पूजा-स्थान है। वहाँ पटों में जड़ी कुछ देवी-देवताओं की छवियाँ, उनके गुरु और गुरुमाँ के चित्र तथा कुछ बाणलिंग हैं। दीवार पर एक खड्ग लटक रहा है; पास ही लाल रंग से रँगा त्रिशूल रखा है। कुछ पोथियाँ, आसन और लाल वस्त्र भी हैं।

    स्वच्छ मिट्टी के फर्श पर सुखद शीतलता है। फूल, अगरु और कपूर की सुगन्ध तैर रही है। कमरे में एक अज्ञात, रोमांचकारी अनुभूति है; भय और भक्ति दोनों साथ काम कर रहे हैं। दोनों अत्यन्त श्रद्धा से उस फर्श की धूल उठाकर मस्तक पर लगाते हैं, जहाँ गुरु की चरण-रज बिखरी है। अचानक अनेक लोगों के एक साथ आने की ध्वनि सुनाई देती है। ऐसा लगता है जैसे एक दल काँसर और घण्टियाँ बजाता हुआ इसी ओर आ रहा हो। युवक (जल्दी से कमरे के बाहर आकर): क्या बात है?

    भाभीजी: कुछ नहीं। यहाँ के निर्धन लोग शव-दाह के लिए इसी मार्ग से आते हैं। वे ऊँची ध्वनि में काँसर और घण्टियाँ बजाते हुए चलते हैं; यही उनकी रीति है। युवक: इसका अर्थ है कि यहाँ श्मशान भी है? भाभीजी: हाँ, थोड़ा आगे नदी का किनारा है। वहीं सूखी लकड़ियाँ बटोरकर शव का दाह करते हैं, अथवा भूमि खोदकर दफना देते हैं। किन्तु रात में कोई इस मार्ग से दाह करने नहीं आता; वे सुबह की प्रतीक्षा करते हैं। अच्छा, अब हाथ-मुँह धो लो और थोड़ा अन्न ग्रहण कर लो।

    पेट में तीव्र भूख है। बरामदे में शीघ्र आसन बिछाए जाते हैं। शाल-पत्तों की थालियों में चावल, किसी साग की भुजिया और मछली का पतला…

    …झोल के साथ भोजन परोसा गया है। युवक जल्दी से एक आसन पर बैठकर पूछता है— युवक: और आप लोग? भाभीजी: बैठिए, हम भी साथ ही बैठेंगे। हमारे गुरुदेव स्त्रियों को पहले भोजन ग्रहण करने का आदेश देते हैं। लो, आरम्भ करो। अनुमति मिलते ही युवक बिना विलम्ब भोजन करने लगता है। भोजन समाप्त होने पर तन और मन की तृप्ति से आँखें मानो बन्द होने लगती हैं। भाभीजी (सारे काम समाप्त करके): भोजन ठीक बना था न? कोई विशेष असुविधा तो नहीं हुई?

    युवक: अन्नपूर्णा के हाथों से अन्न ग्रहण करके केवल तृप्ति का स्वाद मिला; भोजन का अलग स्वाद समझ ही नहीं पाया। भाभीजी (मुस्कराकर): बेटा, क्या तुम साहित्यकार हो? तुम लोगों का परिचय तो पूछा ही नहीं। पण्डित: मैं प्रशान्त बनर्जी हूँ। युवक: और मैं शाश्वत घोष। भाभीजी: अच्छा, प्रशान्त बाबू, आप बहुत परिचित-से लग रहे हैं। बताइए, मैंने आपको कहाँ देखा है? या यह मेरे मन का भ्रम है?

    प्रशान्त: हाँ, अब मैंने भी आपको पहचान लिया है। आपने मुझे सौरभ के घर देखा था। सौरभ मेरा मित्र और आपका गुरु-भाई है। उसने गुरुजी से मिलाने के लिए मुझे अपने घर की एक पूजा में बुलाया था। आप भी उस दिन वहाँ थीं। मैंने आपसे अनुमति लेकर पूजा-कक्ष में प्रवेश करना चाहा था, पर आपने रोकते हुए कहा था, “अब जो पूजा होने वाली है, वह सबके सामने नहीं होती…”

    “…इस मार्ग में अनेक गुप्त पूजाएँ होती हैं। आप कुछ देर प्रतीक्षा कीजिए।”

    प्रशान्त: उसके बाद द्वार बन्द करके आपमें से कई लोग भीतर चले गए। मैं बहुत देर तक बाहर प्रतीक्षा करता रहा। पूजा में देर होने के कारण फिर आप लोगों से भेंट नहीं हुई। भाभीजी: हाँ, याद आया। लगभग छह-सात महीने हुए होंगे। सौरभ ने बड़ी धूमधाम से पूजा कराई थी। अनेक आमन्त्रित लोग भी थे, इसलिए मैं ध्यान नहीं दे पाई। तो आप कुशल से हैं? प्रशान्त: हाँ। गुरुदेव के आशीर्वाद से अनेक समस्याओं के बाद भी कोई चीज मुझे परास्त नहीं कर सकी।

    प्रशान्त: आशा थी कि गुरु की अनुमति लेकर पत्नी सहित इसी पथ पर जीवन व्यतीत करूँगा। उसकी बात समाप्त होते ही भाभीजी बोल उठती हैं— भाभीजी: अवश्य। किन्तु प्रशान्त बाबू, इस पथ पर जीवन केवल बिताया नहीं जाता; जीवन को जाना भी जा सकता है। हमारे पागलाबाबा कहते हैं—जिसके पास कुछ नहीं, वह वृक्ष के नीचे ही सोकर रात काट लेता है; और जिसके पास सब कुछ है, वह कहाँ सोएगा—इसी चिन्ता में सारी रात जागता रहता है। इसलिए जीवन को केवल काटना नहीं चाहिए; जीवन को जानने के आनन्द में जीना चाहिए।

    प्रशान्त: हाँ, समझ गया। आयु बढ़ गई है, किन्तु भाव की परिपक्वता उसी अनुपात में नहीं बढ़ी। अब मुझे चलना होगा। भाई, लौटने का मार्ग लम्बा है—चलो, उठें। सम्भव है मैं कल न आ सकूँ; घर पर कुछ लोग आने वाले हैं। शाश्वत: तो क्या मैं कल अकेला आऊँ? मुझे तो अत्यन्त आवश्यकता है। भाभीजी: तब तुम आज की रात यहीं बिता लो, भाई। तुम बहुत व्याकुल दिखाई देते हो—यदि यहाँ रहने में तुम्हें कोई बड़ी असुविधा न हो। शाश्वत: नहीं, नहीं, इसमें कैसी असुविधा? यहाँ रात…

    शाश्वत: यहाँ रात बिताना तो क्या, मैं अपना पूरा जीवन यहीं बिताना चाहता हूँ; इसीलिए तो यहाँ आया हूँ। दादा: तब आज तुम यहीं रह जाओ और कुटीर-जीवन का अनुभव बढ़ा लो। प्रशान्त: अच्छा भाई, अब मैं चलता हूँ। आप लोगों को बहुत धन्यवाद। अपने इस मित्र को आपके पास छोड़ रहा हूँ। फिर भेंट होगी। पागलाबाबा—अर्थात गुरुजी—को मेरा प्रणाम कहिएगा। शाश्वत भाई, यदि कल नहीं आ पाया तो परसों अवश्य आऊँगा।

    प्रशान्त: तुम अच्छे रहना। शाश्वत: मैं तुम्हें थोड़ा आगे तक छोड़ आता हूँ। दादा-भाभीजी, अभी लौटता हूँ। (दोनों कुटिया से बाहर निकल जाते शाश्वत: मित्र, तुम्हें किन शब्दों में धन्यवाद दूँ? मेरे पास कहने के लिए शब्द ही नहीं हैं।

    प्रशान्त: नहीं भाई, तुम्हारे साथ समय बिताकर मुझे भी बहुत अच्छा लगा। मन में जमा बहुत-सी बातें कहकर मैं भी काफी हल्का अनुभव कर रहा हूँ। अब तुम लौट जाओ; वे लोग प्रतीक्षा कर रहे होंगे। शाश्वत: मित्र, सावधानी से जाना। फिर मिलेंगे। यह कहकर वह दिशा बदलता है और कुटिया लौट आता है। दादा और भाभीजी बरामदे में बैठे हैं। दादा: आओ भाई, यहाँ आओ। थोड़ी बातें करते हैं। तुम कहाँ से आए हो? तुम्हारा घर कहाँ है? शाश्वत: मैं कोलकाता से आया हूँ।

    शाश्वत: हरिद्वार में दो रात बिताने के बाद प्रशान्त दा से परिचय हुआ और फिर यहाँ आ गया। दादा: ओह, कोलकाता से? क्या इस ओर घूमने आए थे? कोलकाता वाले घर में कौन-कौन हैं? शाश्वत: नहीं, ठीक घूमने नहीं आया। गुरु की खोज में यहाँ चला आया हूँ।

    शाश्वत: हमारे घर में पिता, माँ, बड़े भाई, भाभी और भतीजी—सब साथ रहते हैं। वास्तव में हम कोलकाता से कुछ भीतर अपने गाँव में रहते हैं। गाँव में हमारा तीन-मंजिला पक्का मकान है। पिता चिकित्सक हैं, बड़े भाई सरकारी विद्यालय में अध्यापक हैं। मैंने भी चिकित्सा की पढ़ाई पूरी की और कुछ समय नगर के एक अस्पताल में काम किया। फिर नौकरी छोड़कर माता-पिता की अनुमति से इधर-उधर घूमने लगा; घूमते-घूमते आज इस कुटिया तक पहुँच गया। भाभीजी: यह क्या! सब कुछ क्यों छोड़ दिया?

    शाश्वत: वह एक विचित्र घटना है। मेरे बचपन का एक मित्र था—हमारे ही गाँव में पास रहता था; उसका नाम तुहिन था। तुहिन के परिवार के पास काफी सम्पत्ति थी। वह अपने माता-पिता की इकलौती सन्तान था। उसके माता-पिता मुझे अपने दूसरे बेटे की तरह मानते थे; इसलिए तुहिन भी मेरे सगे भाई जैसा था। तुहिन के पिता प्रतिष्ठित व्यवसायी थे और तुहिन उन्हीं का व्यवसाय सँभालता था। व्यापार के सिलसिले में उसे राँची, पटना और आसनसोल जाना पड़ता था। छुट्टी मिलने पर मैं भी उसके साथ घूम आता था।

    इस प्रकार हमारे दिन बड़े आनन्द से बीत रहे थे। इसी बीच एक दिन तुहिन की माँ ने कोलकाता के एक प्रतिष्ठित परिवार की लड़की से उसका विवाह करने का निर्णय लिया। तुहिन ने मुझे भी साथ चलकर लड़की को देखने के लिए कहा। उसके कहने पर एक दिन अपना काम छोड़कर मैं सुबह ही वहाँ पहुँच गया। तुहिन की भावी पत्नी, उसके परिवार का व्यवहार, लड़की का रूप और उसकी अभिजात शिष्टता—सबने अच्छा प्रभाव डाला।

    दोनों परिवार सहमत हुए और तुहिन भी बहुत आकर्षित था। बात के अनुसार विवाह का महीना और दिन निश्चित हो गया—नवम्बर में तिथि रखी गई। तुहिन और रूपा—रूपा अर्थात तुहिन की भावी पत्नी—एक-दूसरे को बेहतर जानने की इच्छा से अधिक मिलने-जुलने लगे।

    मैं भी प्रायः उनके साथ रहता था। रूपा मजाक में मुझे ‘देवर’ कहती और मैं उसे ‘भाभीजी’ बुलाता। हमारा सम्बन्ध बड़ा हँसी-मजाक वाला था। रूपा के घर में एक प्रतिष्ठित काली-मन्दिर था, जहाँ नित्य पूजा होती थी। काली-पूजा के दिन रातभर जागकर बड़ी धूमधाम से पूजा, बलि और होम होता था। उस वर्ष दीपावली अक्टूबर में थी। तुहिन के परिवार के साथ मैं भी पूजा में आमन्त्रित था। हमने पूरा दिन और सारी रात साथ में आनन्दपूर्वक बिताए। अगले दिन पूजा देखकर और भोग ग्रहण करके घर लौटते-लौटते कुछ देर हो गई।

    घर लौटने पर रातभर जागने की थकान थी और बहुत-सी बातें अभी बाकी थीं; इसलिए तुहिन ने वह रात हमारे घर बिताई। अगली सुबह रूपा का फोन आया। उसने भयभीत स्वर में तुहिन को एक विचित्र स्वप्न बताया। उसने सुना था कि भोर का स्वप्न सच हो जाता है, इसलिए वह बहुत डर गई थी। स्वप्न में वे किसी अनजान स्थान पर गए थे और मैं भी उनके साथ था।

    रूपा ने बताया कि मार्ग में गाड़ी से जाते समय किसी ऊँचे स्थान से उनकी गाड़ी पानी में गिर गई और वह डूबकर मर गई। यह सुनकर तुहिन ने कहा, “शाश्वत और मैं गाँव के लड़के हैं; दोनों तैराकी के चैम्पियन हैं। हम तुम्हें पानी में डूबकर मरने नहीं देंगे। इन बातों की चिन्ता मत करो।” फिर भी रूपा की शंका दूर नहीं हुई। उसने कहा, “लोग कहते हैं कि भोर का स्वप्न कई बार सच हो जाता है; इसलिए मुझे बहुत डर लग रहा है।” तुहिन बोल उठा, “हाँ, सच हो सकता था—यदि तुम्हारे स्वप्न में वह पानी न होता!” और ठहाका लगाकर हँस पड़ा।

    तुहिन की हँसी सुनकर रूपा का तत्कालिक भय दूर हो गया। उधर विवाह का दिन निकट आ रहा था। तुहिन ने स्वभावतः सारी जिम्मेदारियाँ मुझ पर डाल दीं और स्वयं रूपा के साथ व्यस्त रहा। मैं भी इसलिए…

    …मैं चिकित्सा-कार्य से अधिक विवाह की तैयारियों में ध्यान देने लगा। देखते-देखते तुहिन और रूपा का विवाह बड़ी धूमधाम से सम्पन्न हो गया। सारी व्यवस्था सफलतापूर्वक पूरी होने पर दोनों परिवारों से मुझे बहुत प्रशंसा मिली। विवाह के बाद तुहिन और रूपा ने पहला महीना बड़े आनन्द से बिताया। अब तुहिन को व्यवसाय के काम से कुछ दिनों के लिए फिर बाहर जाना था। रूपा भी उसके साथ जाने की जिद करने लगी। तुहिन ने मुझे यह बात बताई और मुझे भी उनके साथ चलने को कहा।

    उसका विचार था कि जब वह काम में व्यस्त हो, तब रूपा अकेली न पड़े; इसलिए वह मुझे भी साथ रखना चाहता था। उसकी बात मानकर मैं उनके साथ चला गया। कोलकाता से रेल द्वारा पटना पहुँचे, वहाँ एक रात बिताकर राँची आए। राँची में दो रात रहने के बाद थोड़ा रोमांच करने के उद्देश्य से तुहिन ने गाड़ी किराए पर ली और सड़क मार्ग से लौटने की इच्छा प्रकट की। रूपा भी प्रसन्न हो गई। राँची से ओडिशा होते हुए कोलकाता लौटने की योजना बनाकर हम भोर में ओडिशा की ओर निकल पड़े।

    ओडिशा घूमकर कोलकाता लौटते समय, जब हम महानदी के ऊपर से जा रहे थे, तभी दुर्घटना हुई। शीतकाल की संध्या अभी-अभी उतरी थी। हमारी गाड़ी तेज गति से नदी पार कर रही थी। पुल के अन्तिम भाग में एक लॉरी ने नियन्त्रण खोकर हमारी गाड़ी को टक्कर मार दी और गाड़ी ऊपर से नदी में जा गिरी। किनारा बहुत दूर नहीं था। हम सभी अपने-अपने ढंग से पानी में जा गिरे। तुहिन ने एक हाथ से रूपा का हाथ पकड़ा और दूसरे हाथ से तैरते हुए उसे किनारे ले आया।

    मैं भी तैरकर किनारे पहुँचा, किन्तु तब तक रूपा का शरीर निश्चल हो चुका था। हम उसे शीघ्र अस्पताल ले गए। हम दोनों को कोई बड़ी चोट नहीं लगी थी। चिकित्सक ने जाँच के बाद बताया कि रूपा की हृदयगति रुक गई थी। यह सुनते ही तुहिन बेहोश हो गया। यह सब देखकर-सुनकर मैं भी…

    …स्तब्ध रह गया और बहुत अस्वस्थ अनुभव करने लगा। हम दोनों अस्पताल में भर्ती हुए; तुहिन बार-बार चेतना खो रहा था। तीन दिन बाद उसकी अवस्था कुछ सामान्य हुई और हमें घर वापस लाया गया। रूपा का वह भोर का स्वप्न मानो अक्षरशः सच हो गया था। तुहिन धीरे-धीरे स्वस्थ हुआ, किन्तु कभी-कभी उसका व्यवहार ऐसा हो जाता मानो वह किसी अनजाने आवेश में हो। चिकित्सकीय उपचार से वह शीघ्र सुधर रहा था और उसका आचरण फिर पहले जैसा सामान्य होने लगा।

    किन्तु कभी-कभी वह अकेला रहना चाहता और मुझसे कहता, “रूपा बहुत भोली थी; वह मुझ पर विश्वास नहीं कर सकी।” रूपा कैसी है, यह जानने के लिए वह प्लैंचेट करना चाहता था। जो भी व्यक्ति यह काम करा सके, उसकी खोज का उसे जुनून हो गया। कभी पुस्तकें पढ़ता, कभी किसी-न-किसी से पूछता। इसी क्रम में वह एक मुस्लिम फकीर बाबा के पास पहुँचा, जिसके बारे में कहा जाता था कि वह बहुत बड़ा तान्त्रिक है।

    लोगों का दावा था कि वह किसी भी मृत व्यक्ति को आँखों के सामने ला सकता है, उससे बात करा सकता है और उसके विषय में जानकारी दे सकता है। तुहिन को विश्वास हो गया कि वही फकीर बाबा उसे रूपा का पता देगा; इसलिए वह उसकी ओर आकर्षित होकर बार-बार वहाँ जाने लगा। उसने मुझे भी साथ चलने को कहा, पर इन बातों पर मेरा विश्वास बहुत कम था; अतः आवश्यक काम का बहाना बनाकर मैं टाल गया। तुहिन मुझे कुछ बताए बिना दिन-रात फकीर बाबा के पास जाता रहा।

    फकीर बाबा ने उससे कहा कि किसी सन्ध्या वह काँच की एक बोतल और सफेद कागज लेकर वहाँ आए। उस दिन जब मैं तुहिन से मिला, वह काँच की बोतल, कागज और कुछ अन्य सामान जुटाने में व्यस्त था। मेरे पूछने पर कि इन सबका अर्थ क्या है, उसने बताया कि अगली सन्ध्या वह इन्हें लेकर फकीर बाबा के पास जाएगा और बाबा कथित रूप से उसे रूपा का पता…

    …देगा। मैंने उसे समझाने का प्रयास किया कि इन बातों में न पड़ना ही शायद अच्छा होगा। वह यह मानने को तैयार नहीं था कि रूपा अब वापस नहीं मिलेगी। मेरी बात अनसुनी करके वह अगली सन्ध्या फकीर बाबा के पास चला गया। उसके अगले दिन रात को लौटकर उसने बताया कि उसे रूपा का पता मिल गया है। उसका दावा था कि उस कागज पर रूपा ने लिखा था, “तुहिन, मैं तुमसे बहुत प्रेम करती हूँ।” उसने कहा कि वह रूपा को अनुभव कर सका और रूपा के शरीर की सुगन्ध अब भी उसके साथ घूम रही है।

    उस दिन तुहिन बहुत प्रसन्न था। वह मुझे रूपा को अनुभव करने का अपना आनन्द समझाने लगा और बोला कि वह मुझे भी रूपा का अनुभव कराएगा। मैं चुपचाप सुनता रहा। उसके लिए मन में गहरी करुणा उमड़ी। उसकी बातों से रूपा फिर याद आ गई और मेरा मन भी भारी हो गया। आह, विधाता! उनके पिंजरे में बन्द स्वप्न पक्षी बनकर आकाश में उड़ गए; केवल खाली पिंजरा रह गया। तुहिन के सिर पर हाथ फेरकर मैं घर लौट आया। उधर तुहिन फिर रूपा की स्मृतियों में डूब गया।

    कुछ दिन इसी प्रकार बीतने के बाद तुहिन को मानो सचमुच रूपा दिखाई देने लगी और वह उससे बातें करने लगा। वह अपना व्यवसाय पहले की तरह करता रहा। उसका व्यवहार असामान्य होते हुए भी उस समय हमें उसे चिकित्सक के पास ले जाने की आवश्यकता अनुभव नहीं हुई। फिर भी वह कभी-कभी अन्यमनस्क हो जाता और अचानक किसी अपरिचित भाषा तथा बदले हुए स्वर में मुझसे कुछ कहता। मैं उन शब्दों को नहीं समझ पाता था; केवल एक तारीख समझ में आती थी।

    फिर वह सामान्य होकर बातें करने लगता। एक दिन दोपहर बाद मैं तुहिन के घर गया। उसने मुझे बैठाया और एक प्याली चाय दी। उसका व्यवहार सामान्य था, किन्तु उसी बीच अचानक वह फिर अलग ढंग से व्यवहार करने लगा। उसका…

    उस अपरिचित भाषा को फिर सुनने की इच्छा से मैंने उसकी आवाज रिकॉर्ड कर ली। उसके सामान्य हो जाने पर मैं घर लौटा और रिकॉर्डिंग बार-बार सुनी, किन्तु ‘27 तारीख’ के अतिरिक्त कुछ समझ नहीं पाया। फिर एक दिन—वह रविवार था और 27 तारीख भी—हमने साथ समय बिताने का निश्चय किया था, इसलिए मैं सुबह तुहिन के घर गया। सामान्यतः वह सुबह बिस्तर छोड़ देता था, पर उस दिन काफी देर होने पर भी नहीं उठा था। मुझे देखते ही वह उठकर बैठ गया।

    मुझे देखते ही वह मानसिक रूप से बहुत बोझिल लगा; सम्भवतः रात में ठीक से सोया नहीं था। मेरे लिए चाय कहने की जल्दी में कमरे से निकलते समय उसका पैर अटक गया। वह उछलकर चौखट से टकराया और सीढ़ी के लोहे के फाटक पर सिर में गम्भीर चोट लगी। वह अचेत हो गया और फिर कभी होश में नहीं आया। मस्तिष्क में रक्तस्राव के कारण तुहिन की मृत्यु हो गई। उस समय मैं पूरी तरह असहाय था। ऐसा लगा मानो वह मेरे जीवन का आधा भाग अपने साथ ले गया हो; स्वयं को सँभालना कठिन था।

    कुछ दिन बाद, जब मैं कुछ सँभला, तब तुहिन की उस रिकॉर्डिंग को एक ऑडियो विशेषज्ञ के हाथ सौंप दिया। तीन दिन बाद उसकी रिपोर्ट आई। रिपोर्ट में ध्वनि का अर्थ इस प्रकार लिखा था—“हम 27 तारीख को जाएँगे। मैं रूपा… तुम्हारे पास… फिर साथ रहेंगे… तुम्हें ले जाऊँगी। शाश्वत और बाकी… तुम्हें भी शीघ्र…” आगे का अंश स्पष्ट समझ में नहीं आया।

    इन दो विचित्र घटनाओं से दोनों परिवार टूट गए। रिपोर्ट में लिखी बात देखकर सभी मेरे लिए भयभीत हो उठे। उनका कहना था कि मुझे किसी दिव्य शक्ति-सम्पन्न व्यक्ति की शरण में रहना चाहिए। किन्तु मैं यहाँ केवल जीवित रहने की इच्छा से नहीं आया हूँ। क्या ऐसी घटनाएँ सचमुच सम्भव हैं—मैं उनका अर्थ जानना चाहता हूँ। इसीलिए आज सब कुछ छोड़कर यहाँ आया हूँ। इतनी देर से दोनों आश्चर्यचकित होकर शाश्वत के पीछे छूटे जीवन की कथा सुन रहे थे।

    वे दोनों मौन थे।

    शाश्वत की दोनों आँखें छलछला रही थीं। काश आँखों के सामने घटी वे सच्ची घटनाएँ किसी परीकथा की तरह केवल झूठी कहानी होतीं—तब तुहिन उसे इतना दुःख देकर नहीं जा सकता था। दोनों हाथों से आँसू पोंछकर वह बोला, “वास्तव में तुहिन केवल मेरा मित्र नहीं था। उसका चले जाना ऐसा है जैसे शरीर के अनेक अंगों में से एक अंग कट गया हो; वह बार-बार मुझे मेरी अपूर्णता का स्मरण कराता है।” दादा: शाश्वत भाई, कभी-कभी किसी खोई हुई वस्तु को खोजते हुए मनुष्य को कोई अमूल्य रत्न मिल जाता है, जिसके स्पर्श से अंग-विहीन व्यक्ति को भी उस अंग की अनुभूति मिलती है। दुःखी मत हो।

    दादा: जीवन में दुःख ने ही मनुष्य को भीतर से अपूर्ण बनाया है। हमारे पागलाबाबा कहते हैं, “दुःख क्या है, इसे खोजते-खोजते सुख के दिन भाग जाते हैं।” अब लगभग सन्ध्या हो चली थी। सायं-सन्ध्या की तैयारी में भाभीजी उठकर बोलीं, “भाई, तुम कुछ देर बैठो; हम दोनों अपनी नित्यक्रिया पूरी कर लें।” शाश्वत अकेला बैठा आकाश की ओर देखता रहा। अन्धकार उतरने से पहले पक्षी झुण्ड बनाकर अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे।

    उनकी चहचहाहट छुट्टी की घण्टी जैसी थी। दिनभर की कथाएँ वे मानो एक-दूसरे को सुना रहे थे। छोटे-से सिर और दो छोटे पंख—कल वे फिर निकलेंगे। जीवन संघर्ष जीतने का नाम है; तूफान के धक्के से दिशा खो देने पर भी आत्मविश्वास के सहारे वे लौट आते हैं और फिर नई दिशा में उड़ते हैं। उधर शव-दाह करके लोग लौट रहे थे। केवल अनेक पैरों की आहट थी; पास आते चेहरों पर कोई शब्द नहीं।

    वे अपने प्रियजन को दाह के लिए ले गए थे। अग्नि-संस्कार के बाद शरीर का बोझ मानो समाप्त हो गया और लौटते समय उनके कदम जैसे धरती को छुए बिना चल रहे थे। अभी कुछ प्रकाश शेष था; शाश्वत ने सोचा कि स्थान को थोड़ा और देख लिया जाए। वह उठकर आगे बढ़ा। दाईं ओर शायद नदी का तट था और सामने जंगल बहुत घना दिखाई दे रहा था। एक-दो कदम आगे जाते ही जंगल के भीतर दूसरी कुटिया दिखाई दी। सम्भवतः वही सीताराम बाबा की कुटिया थी, जिसका उल्लेख दादा ने किया था। कुटिया देखकर शाश्वत आगे बढ़ा। पैरों के चिह्नों से एक सँकरा मार्ग बन गया था।

    छोटी-छोटी झाड़ियाँ चलते समय कभी-कभी उसके वस्त्र पकड़कर खींचतीं, मानो किसी अपरिचित व्यक्ति से थोड़ा परिचय करना चाहती हों। इस पथ पर अकेले चलना रोमांचकारी था। उधर लगभग अन्धकार हो चुका था। हाथ में टॉर्च होती तो कुछ और आगे जाया जा सकता था। इस प्रकार अँधेरे में अकेले बढ़ना अनावश्यक रूप से स्वयं को डराने जैसा था। इसलिए उसने कुटिया लौटना ही बुद्धिमानी समझा। प्रवेश पर दादा और भाभीजी खड़े थे। भाभीजी: अरे भाई, कहाँ चले गए थे?

    भाभीजी: अन्धकार में अपरिचित मार्ग पर रास्ता भटक जाने का भय रहता है। शाश्वत: नहीं, नहीं, यहीं सामने था। केवल यह देखने गया था कि नदी का किनारा किस दिशा में है। भाभीजी: नदी का तट तो काफी दूर है। बेटा, तुम्हारे भीतर अच्छा साहस है! शाश्वत: नहीं, ऐसी बात नहीं। गाँव का लड़का हूँ, अँधेरे का अभ्यस्त हूँ; इसलिए अधिक भय नहीं लगता। भाभीजी: किन्तु इस पथ पर तो प्रकाश में भी बहुत साहस चाहिए।

    शाश्वत: क्यों? प्रकाश में किस बात का भय? भाभीजी: तुमने कहा था न कि दीक्षा लेकर इसी पथ पर चलोगे? यह पथ अन्धकार को भी देखना सिखाता है। अँधेरे में तो अनजाना भय रहता ही है…

    भाभीजी: …किन्तु प्रकाश में देखकर कभी-कभी हड्डियाँ तक ठण्डी पड़ जाती हैं। शाश्वत: पर दिखाई क्या देता है? भाभीजी: मान लो, हवा से बना कोई मनुष्य तुम्हारे सामने खड़ा है, फिर भी तुम अपनी सामान्य आँखों से उसे नहीं देख पा रहे। जब ज्ञान का प्रकाश मन में प्रवेश करता है, तब दृष्टि का प्रकाश बढ़ता है और उसी प्रकाश में वह सामने दिखाई देने लगता है।

    भाभीजी: वह कोई आकृति बनाकर तुम्हारे सामने खड़ा हो सकता है और हवा में डोल सकता है—मानो हवा से भरा कोई बड़ा गुब्बारा हो। मुख, हाथ-पैर और शरीर का आकार बनाकर तुम्हें बुला सकता है; शायद कुछ बताना, तुम्हें छूना या भय दिखाकर वहाँ से हटाना चाहता हो। ऐसी वस्तुओं का अनुभव अन्धकार को पहचानने पर होता है। शाश्वत: इसका अर्थ है कि वे कोई हानि पहुँचा सकते हैं, या केवल डराते हैं? भाभीजी: निराधार भय मन के अन्धकार में होता है। प्रकाश में मनुष्य देखकर और विचार करके डरता है—है न?

    शाश्वत: ठीक है, किन्तु वे हानि पहुँचाएँगे ही क्यों? क्या हम उन्हें कोई हानि पहुँचाते हैं? भाभीजी: नहीं। अन्धकार हट जाए तो दोनों एक-दूसरे को देख सकते हैं। अपरिचय का भय भी समय और पहचान के साथ शान्त हो जाता है; तब हानि का कारण नहीं रहता। शाश्वत: तो भूत-प्रेत होते भी हैं और उन्हें देखा भी जा सकता है? भाभीजी: केवल इसलिए कि तुमने नहीं देखा, यह नहीं कहा जा सकता कि वे होते ही नहीं। कौन जाने, शायद…

    भाभीजी: …बहुत कुछ ऐसा है जिसे हमने न देखा है, न समझा है। केवल इसी कारण उसे स्वीकार न करने का अहंकार भी उचित नहीं। शाश्वत: इसे ठीक अहंकार नहीं कहूँगा। अनेक लोगों ने बहुत वचन दिए, फिर भी मुझे कभी ऐसी कोई वस्तु नहीं दिखा सके। इसलिए इस विषय में मेरा विश्वास बन नहीं पाया। भाभीजी (थोड़ा हँसकर): कैसा वचन? कौन तुम्हें क्या दिखाएगा—भूत? क्या भूत या भगवान किसी दूसरे को दिखाए जा सकते हैं? उन्हें तो स्वयं देखना पड़ता है। देखोगे भी कितना?

    भाभीजी: इस पथ पर कुछ दिन चलो। तब वह तुम्हारे साथ-साथ घूमेगा और तुम स्वयं कहोगे—“अब और नहीं देखना, बाबा! मुझे थोड़ा अकेला रहने दो।” यह कहकर वह हँस पड़ती हैं। भाभीजी: अब काफी अन्धकार हो गया है। मैं हैरिकेन लालटेन जलाकर लाती हूँ। वह कमरे के भीतर चली जाती हैं। दादा: शाश्वत, यदि इस पथ पर रहना है तो बताओ—क्या कभी ऐसे जंगल में रात बिताई है? शाश्वत: मैं इस पथ को छोड़कर बाकी सभी रास्ते बन्द करके आया हूँ। जंगल में मित्रों के साथ रातें बिताई हैं…

    शाश्वत: …किन्तु ऐसी हैरिकेन-लालटेन वाली परिस्थिति में नहीं। वहाँ बिजली, पंखे और भवन—सब आधुनिक सुविधाएँ थीं, इसलिए विशेष भय नहीं लगा। (भाभीजी हाथ में हैरिकेन लेकर सामने आ खड़ी होती भाभीजी: तो क्या यहाँ भय लग रहा है, भाई? शाश्वत: वैसा नहीं, पर इस वातावरण में हल्का भय अवश्य होता है। आपको देखकर और आपके साथ रहने से अब अधिक डर नहीं लग रहा। लेकिन आपकी बात के अनुसार यदि कोई वस्तु मेरे सामने आ खड़ी हुई और मुझे दिखाई दी, तो क्या होगा—नहीं जानता। दादा: तब तुम्हें थोड़ी सावधानी दे दूँ, भाई। पूजा की किसी वस्तु को…

    दादा: …बिना पूछे हाथ मत लगाना। नहीं तो ऐसा कुछ देख सकते हो कि मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाए। शाश्वत: नहीं, नहीं। मैं इन वस्तुओं को बिल्कुल नहीं छुऊँगा। अच्छा दादा, क्या आपके गुरुदेव ने कभी आपको कोई अजागतिक वस्तु दिखाई है? दादा (हल्की मुस्कान के साथ): उन्हें कुछ दिखाने की आवश्यकता नहीं। कुछ दिन उनके साथ रहोगे तो समझ जाओगे कि वह मनुष्य स्वयं ही अजागतिक है। आरम्भ में मैं भी बहुत आश्चर्य करता था। विज्ञान का विद्यार्थी होने के कारण बुद्धि से परखने का प्रयास किया, पर उस गणित का समाधान नहीं मिला।

    दादा: बाद में समझा कि केवल एक विषय का ज्ञान लेकर ऐसे लोगों का निर्णय नहीं किया जा सकता; इसलिए अब आश्चर्य नहीं करता। शाश्वत: आप लोगों से गुरुजी की बातें सुनकर और उनके विषय में जानकर उन्हें देखने की इच्छा और बढ़ गई है। वे कल ही आएँगे, इसलिए मैं बहुत उत्साहित हूँ। भाभीजी: हाँ, कल ही आएँगे। पर अब चलो, जल्दी भोजन कर लें। उनकी कथा आरम्भ हुई तो सारी रात बीत जाएगी।

    भाभीजी: इसलिए अभी रहने दो। उन्हें सामने देखकर स्वयं उनके विषय में विचार करना। हाँ भाई, रात में केवल पराठा और अचार है; कुछ और नहीं बना। तुम्हें असुविधा तो नहीं होगी? शाश्वत: आप क्या कह रही हैं? इस जंगल के भीतर पराठा मिलना ही कल्पना से परे है। मुझे तो बुरा लग रहा है कि शायद आप लोग मेरे कारण व्यस्त हो गए। भाभीजी: तुम्हें बुरा लगने की कोई बात नहीं। मैंने तुम्हें अपने भाव से भाई कहा है। भाई कहने में इतना अपनापन तो होना ही चाहिए, और भाई का काम करना ही पड़ता है। लो, सब साथ बैठते हैं।

    भाभीजी: लो, सब बैठें। इस हैरिकेन की रोशनी में पराठा और अचार खाकर देखो—बहुत अच्छा लगेगा। शाश्वत: हाँ, चलिए। मैं भी बहुत उत्साहित हूँ। भोजन समाप्त होने पर शाश्वत पूछता है— शाश्वत: अच्छा दादा, क्या आप लोग यहीं रहते हैं या कहीं और? दादा: नहीं। यहाँ से लगभग बीस किलोमीटर दूर हमारा छोटा-सा घर है; वहीं हम दोनों का गृहस्थ जीवन है। सप्ताह में एक दिन, अथवा दस दिनों में एक बार यहाँ आते हैं। यदि वे आदेश दें तो कभी-कभी यहीं ठहर जाते हैं।

    शाश्वत: ओह! इसका अर्थ है कि आप गृहस्थ हैं और संसार में रहते हुए ही दीक्षा ली है? दादा: हाँ। इसमें क्या हुआ? गृहस्थ होने पर क्या पूजा नहीं की जा सकती? हमारे गुरुजी पागलाबाबा भी गृहस्थ हैं; उनका घर कोलकाता में है। शाश्वत: तब इस आश्रम में कौन रहता है? दादा: कोई नहीं। जब पागलाबाबा यहाँ आते हैं, तब उनसे मिलने वाले सभी लोग इस कुटिया में आ जाते हैं। अन्य समय हम ही बीच-बीच में आकर इसकी देखभाल कर जाते हैं।

    शाश्वत: अच्छा, पागलाबाबा—अर्थात गुरुजी—का भी परिवार है, या वे कोलकाता में अकेले रहते हैं? दादा: हाँ, पूरा गृहस्थ परिवार है। हमारे गुरु, गुरुमाँ और गुरुपुत्र—सभी हैं। पागलाबाबा कभी-कभी पूरे परिवार के साथ यहाँ आते हैं।

    भाभीजी: शाश्वत भाई, क्या इस बरामदे में सो सकोगे, या तुम्हारे लिए कमरे में व्यवस्था करूँ? शाश्वत: नहीं, नहीं। मैं इसी बरामदे में सो जाऊँगा; मुझे कोई असुविधा नहीं होगी। भाभीजी: तब तुम और दादा इसी बरामदे में सो जाओ। शाश्वत: नहीं, मैं यहाँ अकेला रह सकता हूँ। गर्मी का मौसम है और हवा भी अच्छी चल रही है; बरामदे में अकेले सोना सुखद लगेगा। भाभीजी: लेकिन अकेले सोते हुए भय तो नहीं लगेगा? शाश्वत: आप लोग पास ही हैं, और पूजा-गृह में कैसा भय?

    शाश्वत: मेरे थैले में टॉर्च है। कोई असुविधा हुई तो उसे जलाकर शायद आपको थोड़ा परेशान करूँगा। आप लोग सो जाइए। भाभीजी: तब सो जाओ; हमें सुबह बहुत जल्दी उठना है। (वह बरामदे में चटाई, चादर और तकिए से बिस्तर बना देती भाभीजी: यह हैरिकेन यहीं रहने दो। भय के कारण टॉर्च न मिले तो हैरिकेन हाथ में लेकर हमें पुकारना। शाश्वत (मुस्कराकर): आप मुझे डरा तो नहीं रही हैं? भाभीजी: डराकर उसी को डराया जा सकता है जो पहले से डरता हो—है न?

    भाभीजी: अच्छा, अब सो जाओ। चारों ओर गहरा अन्धकार है। कुटिया के दोनों कुत्ते मानो पहरा देते हुए चारों ओर घूम रहे हैं। निस्तब्धता में शाश्वत के कानों में झींगुरों की आवाज गूँजती है। बीच-बीच में हवा में झूमते विशाल वृक्ष मानो उसे छू लेना चाहते हों। शाश्वत हैरिकेन की लौ धीमी करता है, टॉर्च को सिरहाने रखता है और अभी तकिए पर सिर रखा ही है कि दूर सियारों का एक झुण्ड एक-एक करके पुकारने लगता है।

    क्या हुआ, यह समझने के लिए शाश्वत तकिए के नीचे रखी टॉर्च जलाकर इधर-उधर देखता है। कुछ दूर एक मोटे वृक्ष के पास कोई आकृति-सी सरकती दिखाई देती है। वह वृक्ष के चारों ओर अच्छी तरह प्रकाश डालता है, पर कुछ नहीं दिखता। कुछ घबराकर वह इसे मन का भ्रम समझता है, टॉर्च बुझाकर फिर लेट जाता है। उसने आँखें बन्द ही की थीं कि दोनों कुत्ते भौंक उठते हैं।

    शाश्वत तुरन्त फिर टॉर्च जलाकर वृक्ष की ओर प्रकाश डालता है। उसे लगता है कि कुछ लोग झुण्ड बनाकर खड़े उसे देख रहे हैं; वह ठीक से देख पाता, उससे पहले सब विलीन-से हो जाते हैं। शाश्वत सोचता है, “यह बड़ी कठिनाई है! क्या हो रहा है, कुछ समझ नहीं आता। ये सब मन का भ्रम होगा; जल्दी सो जाना चाहिए।” कुछ देर आँखें बन्द करने के बाद सीताराम बाबा की कुटिया की दिशा से विकट पुकार सुनाई देती है—कोई ‘आओ! आओ!’ कहकर किसी को बुला रहा है। अब शाश्वत को काफी भय लगने लगता है।

    कुछ देर बाद मनुष्य की आवाज पहचानकर उसके मन में थोड़ा साहस लौटता है। वह सोचता है कि अब चादर ओढ़कर सोना ही होगा और आँखें बन्द कर लेता है। अभी हल्की तन्द्रा आई ही थी कि उसे अनुभव होता है मानो कोई उसकी चादर पकड़कर खींच रहा हो। शाश्वत: यह क्या! कौन है? कौन? उसकी चीख सुनकर दादा और भाभीजी कमरे से एक साथ बाहर आते हैं। दादा: क्या हुआ? लगा जैसे तुम्हारी चीख सुनाई दी।

    शाश्वत: हाँ, आपने ठीक सुना। कोई मेरी चादर खींचकर ले जा रहा था; मेरे ‘कौन है?’ कहते ही छोड़ दिया। भाभीजी: अरे! किसे तुम्हारी चादर की आवश्यकता पड़ गई? दिखाओ तो। यह कहकर वह टॉर्च…

    भाभीजी शाश्वत से टॉर्च लेकर बरामदे के चारों ओर देखती हैं। कुत्ते तो वहीं सो रहे हैं; वे चादर नहीं खींचेंगे। आसपास कोई और भी नहीं दिखता। शाश्वत: लेकिन सचमुच कोई मेरी चादर खींच रहा था। मैं पूरी तरह सोया भी नहीं था; स्पष्ट अनुभव हुआ कि कोई शरीर से चादर खींच रहा है। दादा: ठीक है, समझ गया। यहाँ ऐसा होता रहता है। अच्छा हुआ उसने केवल चादर खींची; यदि चादर न ले पाता तो शायद इस बार पैर पकड़कर खींचता।

    दादा: भय मत करो। थोड़ी खींचातानी के अतिरिक्त वह कुछ अधिक नहीं करता। शाश्वत: आपके कहने का अर्थ है कि आप जानते थे यह कौन कर रहा है? भाभीजी (हल्का हँसकर): मैंने कहा था कि दादा को साथ लेकर सोओ। मेरी बात मान लेते तो शायद कोई खींचातानी न करता। तुम्हें अकेला और अपरिचित पाकर उसने ऐसा किया होगा। अब दादा को साथ लेकर सोओ। शाश्वत: हाँ, हाँ। दादा, लगता है यहाँ आपकी आवश्यकता है।

    दादा: ठीक है, मैं यहीं हूँ। अब तुम सो जाओ। शाश्वत: तो आपको पहले से पता था कि ऐसा हो सकता है? दादा: हाँ। इसीलिए पूछा था कि तुम्हें अकेले जंगल में रहने का कोई अनुभव है या नहीं। अब सो जाओ; शेष बातें कल होंगी। शाश्वत करवट लेकर लेट जाता है। दिनभर की थकान बहुत है, ठण्डी हवा शरीर को छू रही है और दादा पास हैं; निश्चिन्त होकर आँखें बन्द करते ही…

    …उसे नींद आ जाती है। कब भोर हो गई, पता नहीं चलता। पक्षियों के झुण्ड की पुकार से शाश्वत जागता है। घड़ी में सुबह के पाँच बजे हैं। भाभीजी आँगन बुहार रही हैं और दादा कमरे में पूजा कर रहे हैं। शाश्वत जल्दी से उठ बैठता है। भाभीजी: क्यों भाई, नींद हुई? शाश्वत: हाँ। पता ही नहीं चला कब सो गया; नींद बहुत अच्छी आई। रात में फिर कोई असुविधा नहीं हुई। भाभीजी: तब हाथ-मुँह धोकर चाय पी लो। चाय तैयार है।

    हाथ-मुँह धोकर चाय पीने के बाद शाश्वत कहता है, “मैं सुबह-सुबह थोड़ा घूमकर नदी का तट देख आता हूँ।” भाभीजी: हाँ, जाओ; पर शीघ्र लौटना। अच्छा प्रकाश फैल चुका है। शाश्वत जंगल के एकमात्र सँकरे मार्ग से नदी की ओर चलता है; रास्ता भटकने का भय नहीं। चलते-चलते वह तट पर पहुँचता है। उस समय वहाँ कोई नहीं है।

    भोर की शीतल हवा और अपनी गति से बहती नदी शाश्वत के मन को और ताजा कर देती है। वह एक विचित्र आकर्षण अनुभव करता है। तट पर इधर-उधर चलते हुए उसे कुछ अधजली लकड़ियाँ दिखाई देती हैं—शायद शव-दाह के अवशेष। कहीं-कहीं मिट्टी थोड़ी ऊँची है; सम्भवतः लकड़ी के अभाव में शव भूमि में दफनाए गए थे। इस स्निग्ध, निस्तब्ध वातावरण में कोई कुटिया या साधुबाबा दिखाई नहीं देता।

    शाश्वत इसी वातावरण में नदी के किनारे कुछ देर बैठ जाता है।

    घना जंगल है और मानवीय बस्ती लगभग नहीं। नदी के उस पार भी ऐसा ही प्रतीत होता है; हिंसक जीव हो सकते हैं। स्थान को ध्यान से देखने के बाद शाश्वत सोचता है, “अब लौटना चाहिए। गुरुजी आज आने वाले हैं; पता नहीं कब आएँगे। भाग्य में हुआ तो शायद आज ही उनके दर्शन मिल जाएँ।” वह कुटिया की ओर लौटता है। प्रवेश करते ही बरामदे में दादा-भाभीजी और दो अन्य सज्जनों को बातचीत करते देखता है।

    भाभीजी: लो, शाश्वत आ गया! जल्दी आओ। इतनी देर कहाँ घूमते रहे? पागलाबाबा आ चुके हैं। मैंने उन्हें तुम्हारे विषय में बताया है; वे कमरे में हैं। बैठो, पहले परिचय करा दूँ। ये सतीश दा हैं; पागलाबाबा इन्हीं के घर गए थे। दोनों नमस्कार करते हैं। भाभीजी: और ये सुमन हैं—हमारे गुरु-भाई, बहुत अच्छे युवक। सुमन: शाश्वत बाबू, अभी आपकी ही बात हो रही थी। सुना है कल से यहीं हैं। शाश्वत उत्तर दिए बिना पूछता है: गुरुजी कब आए?

    सुमन: अभी कुछ ही देर हुई। शाश्वत: क्या गुरुजी भीतर पूजा कर रहे हैं? भाभीजी: नहीं… ठहरो, देखती हूँ क्या कर रहे हैं। वह कमरे में प्रवेश करती हैं। भीतर से पागलाबाबा किसी को नाम लेकर पुकारते हैं—“हाँ, कहो।” दादा कमरे में जाते हैं। कुछ देर बाद दादा और भाभीजी पागलाबाबा के साथ बाहर आते हैं। दादा: शाश्वत भाई, इधर आओ। यही हमारे गुरुदेव हैं, जिनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। शाश्वत निकट आकर प्रणाम करता है…

    पागलाबाबा शाश्वत को उठाते हैं। पागलाबाबा: शाश्वत, तुम डॉक्टर हो? शाश्वत: हाँ, बाबा। पागलाबाबा: फिर इस पथ पर कैसे? क्या इधर अपना चेम्बर खोलोगे? शाश्वत: नहीं, मैं आपसे मिलने आया हूँ। पागलाबाबा: अच्छा! रमा कह रही थी कि तुम कोलकाता के बड़े डॉक्टर हो। मैंने सोचा, शायद जंगल में रहने वाले साधु-संन्यासियों के सिर का उपचार करने आए हो। मैं तो डर ही गया!

    पागलाबाबा: लोग साधुओं को वैसे भी सनकी और पागल समझते हैं; शायद हमें ठीक करने आए हो। सब हँस पड़ते हैं। शाश्वत: बाबा, वास्तव में मैं अपने ही उपचार के लिए आया हूँ—कैसे ऐसी दीवानगी पाकर आप लोगों की तरह रहा जाए? पागलाबाबा: लो, एक और पागल आ गया! बिना दीवाना हुए पागल कैसे बनोगे, और पागल हुए बिना पत्थर में प्राण कैसे जगाओगे? एक दिन महादेव शिव ढेर सारी राख लगाए मेरे सामने खड़े हुए…

    पागलाबाबा: मैंने पूछा, “बाबा, शरीर पर इतनी राख क्यों?” महादेव मुस्कराकर बोले, “राख हो जाने पर अहंभाव मिटता है; अहंभाव मिटते ही मैं हल्का होकर विलीन हो जाता हूँ। जैसे पक्षी पंख मिलते ही आकाश छूना चाहता है, वैसे आत्मा आकार पाते ही मिट्टी पकड़ना चाहती है।” तुम्हारा नाम क्या था? शाश्वत: मेरा नाम शाश्वत है, बाबा। पागलाबाबा: यहाँ एक रात बीत गई? अच्छा लगा?

    शाश्वत: हाँ, बहुत अच्छा लगा। पागलाबाबा: तब कुछ समय यहीं रहो। मैं सिगरेट जलाकर थोड़ा बाहर घूम आता हूँ। वे कुटिया से निकल जाते हैं। वे लम्बे हैं; धोती लुंगी की तरह पहनी है, हल्का सफेद सूती कुर्ता है और बाल कुछ बिखरे हुए। न जटा है, न लम्बी दाढ़ी; ललाट पर तिलक भी नहीं। गले में केवल कमल-बीज की माला है। पागलाबाबा तेजी से जंगल की ओर चले जाते हैं।

    शाश्वत मोहित-सा पागलाबाबा की ओर देखता रहता है। दादा: भाई, हमारे पागलाबाबा कैसे लगे? शाश्वत की चेतना लौटती है। शाश्वत: क्या कहूँ? सूर्य जैसे प्रकाश को देखने की इच्छा होते हुए भी आँखें खोलकर नहीं देखा जाता; केवल मस्तक झुक जाता है। उन्हें केवल अनुभूति से जाना जा सकता है। सुमन: वाह भाई! तुम्हारे भीतर अच्छा भाव है। लगता है उन्होंने इसे पहचान लिया…

    सुमन: …इसीलिए शायद तुम्हें यहाँ रहने को कहा। शाश्वत उत्तर नहीं देता। बरामदे के एक कोने में बैठा सोचता है—इन्हें पहले कहाँ देखा है? बहुत परिचित लगते हैं, पर याद नहीं आता। भाभीजी (हँसकर): क्या सोच रहे हो, शाश्वत भाई? मन खराब हो गया क्या—पागल बनने से? शाश्वत: नहीं। सोच रहा हूँ कि क्या मैं ऐसी दीवानगी प्राप्त कर पाऊँगा? आपके जैसे स्वस्थ लोग भी जिस दीवानगी के नशे में डूबे हैं…

    भाभीजी: अवश्य कर पाओगे। अब भाव से थोड़ा बाहर आओ और मुरमुरा-बताशा खा लो; सुबह से कुछ नहीं खाया। सुमन, तुम भी खाकर थोड़ी लकड़ी बटोर लाओ; भोजन बनाना है। शाश्वत: गुरुजी कहाँ गए? दादा: लोग जैसे पड़ोस घूमने जाते हैं, वे वैसे ही जंगल घूमते हैं।

    दादा: अभी लौट आएँगे। बात पूरी होते ही पागलाबाबा प्रवेश करते हैं। पागलाबाबा: रमा, आज खिचड़ी का भोग बनाओ। सतीश चावल-दाल साथ लाया है। अरे सुमन, आज ठहरेगा? सुमन: आप आदेश दें तो रुक जाऊँगा। पागलाबाबा: अति-भक्ति चोर का लक्षण है! गुरु आदेश देगा तभी गुरु के पास रहेगा? आदेश न हो तो गुरु की इच्छा के विरुद्ध होगा? मानो मैं हाथ पकड़कर तुम्हें घर से खींच लाया हूँ!

    पागलाबाबा: नहीं बेटा, अपनी इच्छा से रहो या जाओ। नहीं तो नौकरी गई तो दोष गुरु का होगा। सुमन: कैसी बातें करते हैं! आज ही क्यों, मैं कई दिन रहूँगा। नौकरी चली गई तो भी आपको दोष नहीं दूँगा; संन्यास लेकर आपकी सेवा करूँगा। पागलाबाबा: वेतन नहीं मिलेगा। हाँ, एक अजागतिक बैंक-खाता खोल दूँगा; गुरु-सेवा की मजदूरी उसमें जमा होती रहेगी। शाश्वत: बाबा, मुझे अवसर दीजिए। मुझे नौकरी जाने का भय नहीं।

    पागलाबाबा कोई उत्तर नहीं देते। वे रमा से पूछते हैं, “क्या कल से शाश्वत को मछली-भात नहीं खिलाया?”

    शाश्वत: हाँ बाबा, मैंने मछली, भात और साग सब खाया। दादा-भाभीजी ने बड़े स्नेह से खिलाया। पागलाबाबा: सब खाया? अच्छा किया। पेट में आग हो तो सेवा नहीं होती। शक्ति-साधना केवल नमक-भात से नहीं चलती; उसके लिए राजसिक भाव और उसका अभ्यास करने हेतु जागतिक आहार चाहिए। जागतिक भूख मिटाने के लिए जागतिक कर्म भी चाहिए—समझे?

    शाश्वत: समझ गया, बाबा। मुझे आदेश दीजिए—कौन-सा कर्म, कब और कैसे करूँ? मेरा कहीं जाना नहीं है। केवल आपको गुरु रूप में स्वीकार करने का अवसर दीजिए। मुझे गुरु की और परीक्षा नहीं करनी। जिनके सामने अपना अहंभाव खो जाए और जिनके चरण-स्पर्श से जीवन धन्य लगे—वही मेरे गुरु हैं। मुझे स्वीकार कीजिए। यह कहकर शाश्वत गुरु के चरणों में लेट जाता है।

    पागलाबाबा दोनों हाथों से उसे उठाकर ध्यान से उसके मुख की ओर देखते हैं। पागलाबाबा: तुम शाश्वत हो—चिरन्तन। तुम कर सकोगे। मैंने तुम्हें पहले भी पुकारा था, पर तुम समझे नहीं। जैसे शिष्य मार्ग-मार्ग गुरु को खोजता है, वैसे गुरु भी शिष्य के विषय में सोचता है। वह अनेक वेशों में बार-बार संकेत देता है और समय आने पर निकट बुलाता है। तुहिन ने तुम्हारे भीतर कुछ तोड़कर तुम्हें यहाँ बुलाया; सब जानकर भी वह नहीं चाहता था…

    तभी एक व्यक्ति प्रसन्न मुद्रा में कुटिया में प्रवेश करता है। बाबा को देखकर हाथ जोड़कर प्रणाम करता है। व्यक्ति: गुरुजी, आपसे कुछ निजी बात करनी थी। कृपा करके यदि इन लोगों को थोड़ा हटने को कहें… पागलाबाबा: कहिए न। सबके एक-एक कान हैं; कोई असुविधा नहीं होगी। ये आपकी बातें नहीं, केवल मेरी बातें सुनेंगे। आप कह सकते हैं।

    व्यक्ति (कुछ मुस्कराकर): मेरे व्यवसाय की बात है। कई दिनों से काम अच्छा नहीं चल रहा और बहुत-सा धन अटका है। सोचा, आपके आशीर्वाद से यदि वह शीघ्र निकल आए… पागलाबाबा: बहुत अच्छा किया जो मेरे पास आए। मैंने यह दुकान ऐसे निर्जन स्थान पर इसीलिए खोली है, कहीं आप किसी और के पास न चले जाएँ!

    व्यक्ति (संकोच में): मेरा अर्थ था—यदि आप अपने ठाकुर से मेरी कठिनाई बता देते तो शायद इस स्थिति से मुक्ति मिलती। पागलाबाबा: पर यदि मेरे ठाकुर ने हिस्सा माँग लिया तो? आप स्वयं उन्हें कुछ अग्रिम देकर कहिए। वे आपकी बात भी समझेंगे। फल मिलने पर आकर शेष दे जाइएगा।

    व्यक्ति: नहीं, मेरा वह अर्थ नहीं था। बस अपनी बात बताने आया था। वह आसन पर कुछ रुपये रखकर प्रणाम करता है और चला जाता है। पागलाबाबा: सुमन, देख तो—तेरे वेतन का कितना भाग मिला? सुमन: उफ़! हर बार मैं ही? पागलाबाबा: बेटा, मुझे तेरी ही चिन्ता है। सुना है ध्यान में बैठते ही तुझे नींद आती है। काम पर नहाने-खाने का समय नहीं मिलता, इसलिए आँख बन्द करते ही सो जाता है।

    सुमन: नहीं, नहीं। उस दिन पत्नी के साथ रातभर फिल्म देखी थी, इसलिए सुबह से नींद आ रही थी। आँख बन्द करते ही थोड़ी देर लग गई; प्रतिदिन ऐसा नहीं होता।

    पागलाबाबा: तभी तो कहता हूँ—नौकरी छोड़ दे और लोगों की समस्याएँ सुलझाने की दुकान खोल। रात को फिल्म देखना, सुबह थोड़ा सो लेना। लोग ध्यान में बैठा देखकर समझेंगे बाबा समाधि में हैं। बस बाल-दाढ़ी बढ़ाकर लम्बा तिलक लगा लेना; धन्धा चल पड़ेगा और तेरी समस्या भी सुलझ जाएगी।

    भाभीजी: सुमन, पहले लकड़ी ले आओ, नहीं तो भोजन बनने में देर होगी। सुमन जंगल में लकड़ी बटोरने चला जाता है। पागलाबाबा: रमा, आज आलू-चोखा, दाल-भात? साथ में थोड़ा… भाभीजी: अभी तो आपने खिचड़ी-भोग कहा था; अब दाल-भात कहाँ से आया? पागलाबाबा: खिचड़ी और बेगुनी होगी? तब तो कोई बात ही नहीं! क्या कहते हो शाश्वत? तुम्हें खिचड़ी बहुत पसन्द है।

    शाश्वत: हाँ, खिचड़ी और बेगुनी मेरे प्रिय भोजन हैं। पागलाबाबा: तब देर मत करो। अमल, तुम कुछ मुर्गी के अण्डे ले आओ। अमल: हाँ बाबा। आप अण्डा खाएँगे? अभी लाता हूँ। पागलाबाबा: क्यों, केवल तुम तय करोगे लोग क्या खाएँगे? क्या मैं सर्वथा निरामिष हूँ?

    पागलाबाबा: रमा, तुम रसोई में जाओ। सतीश, पूजा की सामग्री तैयार करो और शाश्वत को साथ ले जाओ। सतीश: अच्छा बाबा। आओ शाश्वत भाई, फूल चुनकर लाते हैं।

    पागलाबाबा: शाश्वत, ध्यान से सीखो। यहाँ रहने की योजना है तो पहले पूजा-सामग्री सजाना सीखना होगा; उसके बाद आसन पर बैठना। जाओ, सब देखो। शाश्वत: जाता हूँ बाबा; पहले स्नान कर लूँ। पागलाबाबा: अभी स्नान नहीं हुआ? रहने दो—तुम फूल ले आओ, मैं फूल को ही स्नान करा दूँगा! शाश्वत चकित होकर सोचता है—सचमुच पागलाबाबा की बात समझना कठिन है।

    सतीश: चलो भाई, देर होगी। उनकी बात का अभी अर्थ पकड़ने का प्रयास मत करो। मार्ग में शाश्वत पूछता है: कल वे आपके घर थे न? दिनभर क्या किया? सतीश: क्या बताऊँ! गुरुजी आ रहे हैं सुनकर तुम्हारी भाभी ने अनेक रिश्तेदारों को निमन्त्रित कर दिया था; काफी लोग घर आ गए।

    सतीश: पागलाबाबा पैंट-शर्ट पहनकर घर में आए; आयु में भी मुझसे छोटे हैं। शाश्वत: उनकी आयु कितनी होगी? सतीश: केवल छियालीस। आते ही पत्नी से बोले, “चाय तैयार है न?”

    पागलाबाबा: बिस्कुट के साथ शीघ्र लाओ। कमरा लोगों से भरा था। गुरु आए हैं जानकर सब एक-एक करके प्रणाम करने लगे। उसी बीच वे बोले, “क्या हुआ, चाय बनी नहीं?” मैंने कहा, “अभी आती है; सबका प्रणाम पूरा होते-होते आ जाएगी।”

    पागलाबाबा: खाली पेट विष नहीं पचता। अभी प्रणाम बन्द रखो; पहले कुछ खा लूँ, फिर आरम्भ करना। सब ठिठककर एक-दूसरे को देखने लगे। मैं चाय लाने बाहर निकला तो सभी पीछे आ गए। एक व्यक्ति ने पूछा, “यही दीक्षा देते हैं? यही तुम्हारे गुरुदेव हैं या कोई और?” मैंने कहा, “यही हमारे गुरु हैं और दीक्षा भी देते हैं, किन्तु बहुत लोगों को नहीं।”

    वह बोला, “इसीलिए शायद इनके पास लोग कम आते हैं।” मुझे क्रोध आया। मैंने कहा, “हाँ, क्योंकि वे भीड़ जुटाने के लिए गुरु बनकर नहीं बैठे हैं।”

    सतीश: जिन्हें सद्गुरु की आवश्यकता होती है, वे बिना विज्ञापन के ही अद्भुत ढंग से उनके पास पहुँचते हैं। वे वेशभूषा नहीं देखते; उन्हें गुरु रूप में पाने की आशा से चरणों में मस्तक झुकाते हैं। मेरी बात उसे पसन्द नहीं आई और वह उत्तर दिए बिना हट गया। शाश्वत: उन्हें समझना कठिन है। सामान्य आँखों से जो देखते-समझते हैं, वे उससे कहीं अधिक हैं; इसलिए सबके लिए उन्हें समझना सम्भव नहीं। सतीश: ठीक कहते हो।

    सतीश: कुछ पाखण्डी विज्ञापन और प्रचार के सहारे साधु-वेश धारण करके भगवान का व्यापार करते हैं; लोग उन्हीं पर विश्वास करके ठगे जाते हैं। शाश्वत: सतीश दा, उन्होंने कहा था आसन पर बैठने से पहले पूजा की तैयारी सीखनी होगी। यह सीखने में कितना समय लगेगा?

    सतीश: अलग-अलग पूजाओं की अलग-अलग तैयारी सीखनी होगी। अभी नित्य-पूजा की सामग्री सजाना सीखोगे, फिर धीरे-धीरे शेष। इसमें काफी समय लगेगा।

    सतीश: चिन्ता मत करो। जो पूजा की सामग्री तैयार करता है, उसे भी पूजा का आधा फल मिलता है। समय लगे फिर भी तुम्हारे कर्म का फल आज से आरम्भ हो गया। पागलाबाबा ने अवश्य कुछ विशेष समझा है, तभी इतनी शीघ्र तुम्हें यह काम दिया। शाश्वत: अब समझा। वे मुझे बहुत पहले से पहचानते थे; केवल मैं ही इतने दिन समझ नहीं पाया। इसीलिए वे इतने परिचित लगे।

    शाश्वत: वे मेरे मित्र तुहिन को भी जानते थे। शायद मुझे बहुत पहले आ जाना चाहिए था। अब नहीं छोड़ूँगा। मुझे जानना है कि इतने स्वस्थ लोग ऐसी ‘पागल’ जीवन-पद्धति क्यों अपनाते हैं, जबकि हम स्वयं को ज्ञानी मानकर भी जीवन के अचानक तूफान में दिशाहीन होकर भूल पर भूल करते हैं।

    सतीश: जिन्हें भगवान पर आस्था होती है, उन्हें भगवान ही मार्ग दिखाते हैं और समझाते हैं कि जीवन का तूफान सही मार्ग का संकेत भी ला सकता है। अब फूल एक-एक करके पुष्प-थाली में रखो। बेलपत्र और दूर्वा जल से धोकर फूलों के पास रखो। एक कटोरी में चावल और दो कटोरियों में लाल तथा सफेद चन्दन अलग रखो। दाईं ओर एक पात्र में जल रखकर पुष्करिणी बनानी है।

    सतीश: यह कोशाकुशी है; इसे धोकर उलटा रखो और सामने ताम्रकुण्ड रखो। आसन के बाईं ओर घण्टी, बाईं ओर धूप और दाईं ओर दीप सजाओ। बाईं ओर थोड़ा ऊपर नैवेद्य की थाली रखो; उसके पास…

    सतीश: कपूर, अगरु और तीर्थजल की शीशी नैवेद्य के पास रखो। ये प्रारम्भिक क्रियाएँ हैं; आगे धीरे-धीरे देखकर सीख जाओगे। स्नान समाप्त करके पागलाबाबा लाल वस्त्र पहनकर सामने आते हैं।

    पागलाबाबा: सब व्यवस्थित हो गया? सतीश: अब आप आसन पर बैठ सकते हैं। पागलाबाबा: शाश्वत, शीघ्र स्नान करके आओ। शाश्वत जल्दी स्नान कर, वस्त्र बदलकर कमरे में आता है। सब भूमि पर बैठे हैं; भाभीजी संकेत से उसे बैठाती हैं। गुरुजी बाणलिंग की पूजा कर रहे हैं। शरीर पर रक्तवर्ण वस्त्र और ललाट पर रक्तचन्दन का तिलक—वे बिल्कुल दूसरे मनुष्य जैसे दिखाई देते हैं।

    उनकी दृष्टि कहीं दूर तैरती-सी है; आँखें खुली होकर भी मानो बन्द हैं। वे अपने भाव में किसी दूसरे जगत में विचरण कर रहे हों। इस पूजा में ऊँचे स्वर का मन्त्रपाठ नहीं है; मानो आराध्य देवता से मिलकर तृप्ति का आश्वासन हो। गम्भीर वातावरण में सब मौन होकर पागलाबाबा को देख रहे हैं। तभी घण्टी बज उठती है।

    गुरुजी एक हाथ में घण्टी और दूसरे में बेलपत्र, फूल तथा अर्घ्य उठाकर मन्त्र पढ़ते हुए आरती करते हैं। फिर वह अर्घ्य बाणलिंग पर अर्पित करते और भूमि पर देवता के चरणों में मस्तक रखते हैं। कुछ देर बाद बाणलिंग से फूल उठाकर अपने मस्तक से लगाते हैं और सबके सिर पर थोड़ा फूल रखते हैं। पागलाबाबा: शाश्वत, इधर आओ। वे उसके ललाट पर चन्दन-तिलक लगाते हैं। आँखों में जल और टूटे स्वर में कहते हैं, “जाओ…”

    पागलाबाबा: अब बाहर बैठो। वे आसन छोड़कर उठते हैं। शाश्वत प्रणाम करके बाहर आता है; अन्य लोग भी एक-एक करके प्रणाम कर बाहर चले जाते हैं। पागलाबाबा कुछ समय कमरे में अकेले रहते हैं, फिर बरामदे में आते हैं। शाश्वत: बाबा, क्या अब मुझे कोई काम करना है?

    पागलाबाबा: अभी तुम्हारा कोई काम नहीं। रमा से पूछो; वह बता देगी। भाभीजी: भाई, मेरे साथ आओ और मैं जो करती हूँ उसे ध्यान से सीखो। वह पूजा-स्थान साफ करती हैं, फूल पुष्करिणी में डालती हैं और पूजा-द्रव्य नियत स्थानों पर रखती हैं। भाभीजी: सुमन, बरामदे में भोजन की जगह तैयार करो।

    शाश्वत बरामदे में आता है। पागलाबाबा कुर्सी पर बैठे हैं। सुमन गुरुजी का आसन बिछाता है और भाभीजी भोग सजाकर उन्हें बैठने को कहती हैं। पागलाबाबा: सब लोग साथ में भोग ग्रहण करो। सभी बैठकर भक्ति से भोग और गुरु-प्रसाद ग्रहण करते हैं। भोजन के बाद पागलाबाबा कहते हैं, “सुमन, बरामदे में चटाई और तकिया लगा दे; मैं यहीं थोड़ा विश्राम करूँगा।”

    चटाई-तकिया लगने पर पागलाबाबा लेट जाते हैं और सब लोग उन्हें घेरकर बरामदे में बैठते हैं। तभी एक व्यक्ति कुटिया में प्रवेश करता है। पागलाबाबा: आइए। क्या समाचार है—कुछ तय हुआ? सज्जन: आपके कहने के अनुसार कमरा मिल गया है और सब बहुत प्रसन्न हैं। पागलाबाबा: स्थान अच्छा है न? ठीक है; कल सुबह मैं स्वयं जाकर देख लूँगा।

    सप्तधारा की कुटीर
    सप्तधारा की कुटीर