पवित्र अध्ययन
त्रिपुरातापिनी उपनिषद्
पाठ भगवती त्रिपुरा को नाम देता है; गायत्री के अक्षर-संकेत रोके गये।
पहला अंश खुला है
त्रिपुरा, मन्त्र, यन्त्र और श्रीविद्या-ध्यान।
त्रिपुरातापिनी (मुक्तिका ८०, अथर्ववेद) भगवती त्रिपुरा को नाम देती है और इस घर के मन्त्र-संग्रह में खुली गायत्री के साथ सुनती है।
मुद्रित पाठ का बहुत भाग अक्षर संकेत करता है। वे पंक्तियाँ रोकी गईं। यह परिचय और एक पहचान-वाक्य सार्वजनिक द्वार हैं। गायत्री-पत्र ही सार्वजनिक पाठ है; यह उपनिषद् दूसरी गुह्य गायत्री नहीं।
मुक्तिका ८०, अथर्ववेद। संस्कृत डॉक्यूमेंट्स: त्रिपुरातापिनी (trip-tapi)।
कई उपदेशों में दीर्घ गद्य-मन्त्र पाठ। यह ग्रन्थालय केवल पहचान-अंश खोलता है।
मुक्तिका ८०, अथर्ववेद। संस्कृत डॉक्यूमेंट्स: त्रिपुरातापिनी (trip-tapi)।
समीक्षा में रोके गये पाठ
- gayatri-akshara — मूल पंक्तियाँ मन्त्राक्षर रखती हैं; यह पृष्ठ विद्या का संचालन न बने इसलिए रोकी गईं।