पवित्र अध्ययन
उच्चारण और लिप्यन्तरण के विषय में
जीभ जीवित मुख से सीखती है। ये चिह्न कान का मानचित्र हैं।
प्रारूप — समीक्षा बाकी
इन पृष्ठों पर संस्कृत देवनागरी में और फिर IAST में है। मूर्धन्य, दीर्घ स्वर और विसर्ग रखे जाते हैं। निजी रोमन लिपि नहीं बनाई जाती।
बांग्ला पाठक बांग्ला लिपि में पाठ-सहाय पाते हैं — बंगाल के मुख की सहायता।
हिन्दी पाठक मूल पंक्ति के साथ देवनागरी बाँटते हैं। अलग हिन्दी पाठ-सहाय तभी, जब दिखने वाला रूप मूल मुद्रण से भिन्न हो।
सन्धि संहिता के मुद्रण के अनुसार रहती है, जब तक अध्ययन के लिए शब्द खोले न जाएँ। दण्ड और द्विदण्ड स्रोत के अनुसार हैं।
बाद में साधारण और धीमा पाठ जुड़ेगा। सञ्चिका न हो तो कोई पृष्ठ बजने का नाटक नहीं करता।